Qateel Shifai

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    तेज़ धूप में आई ऐसी लहर सर्दी की
    मोम का हर इक पुतला बच गया पिघलने से
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    तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
    एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
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    आख़री हिचकी तेरे ज़ानूँ पे आए
    मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ
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    चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
    वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
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    जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
    जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
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    दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
    इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
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    वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता
    हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता

    पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो
    सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता

    क्यूँ बख़्श दिया मुझ से गुनहगार को मौला
    मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ'यत नहीं करता

    घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं
    चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता

    किस क़ौम के दिल में नहीं जज़्बात-ए-बराहीम
    किस मुल्क पे नमरूद हुकूमत नहीं करता

    देते हैं उजाले मिरे सज्दों की गवाही
    मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता

    भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी
    मैं आज भी औरों को नसीहत नहीं करता

    इंसान ये समझें कि यहाँ दफ़्न ख़ुदा है
    मैं ऐसे मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता

    दुनिया में 'क़तील' उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई
    जो ज़ुल्म तो सहता है बग़ावत नहीं करता
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    किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह
    वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह

    किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
    छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

    बढ़ा के प्यास मिरी उस ने हाथ छोड़ दिया
    वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल-लगी की तरह

    सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना
    क़ुबूल हम ने किए जिस के ग़म ख़ुशी की तरह

    कभी न सोचा था हम ने 'क़तील' उस के लिए
    करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह
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    क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था
    वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था

    उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू
    वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था

    हम डूब गए जागती रातों के भँवर में
    हाथ उस का हमारे लिए पतवार ही कब था

    आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके
    लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था

    आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले
    इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था

    तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो
    ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार ही कब था

    मशहूर-ए-ज़माना हैं 'क़तील' उस की उड़ानें
    वो दाम-ए-मोहब्बत में गिरफ़्तार ही कब था
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    हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे
    अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
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