Waheed Akhtar

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    ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा
    मैं हूँ मसरूफ़-ए-तस्बीह-ओ-हम्द-ओ-सना
    गो ब-ज़ाहिर इबादत की आदत नहीं है
    रिंद-मशरब हूँ ज़ोहद-ओ-रियाज़त से रग़बत नहीं है
    मगर जब भी चलता है मेरा क़लम
    जब भी खुलती है मेरी ज़बाँ
    कुछ कहूँ कुछ लिखूँ
    तेरी तख़्लीक़ का ज़मज़मा मुद्दआ मुंतहा
    हर्फ़ जुड़ कर बनें लफ़्ज़ तो करते हैं तेरी हम्द-ओ-सना
    या ख़ुदा या ख़ुदा
    मेरे अतराफ़ हैं पेट ख़ाली बदन-ए-नीम-जाँ
    कोई तकता है जब मेरा दस्त-ए-तही
    शर्म आती है मुझ को ख़ुदा-ए-ग़नी
    सोचता हूँ मैं अपनी ज़बाँ रेहन रख दूँ कहीं
    रिज़्क़ से ख़ाली पेटों को भर दूँ
    जो हैं नीम-जाँ उन में जान फूँक दूँ
    और अपने लिए थोड़ी आसाइशें मोल ले आऊँ बाज़ार से
    अपने बच्चों की ज़िद पूरी कर दूँ
    जो वाक़िफ़ नहीं हैं मईशत के अंदाज़-ओ-रफ़्तार से
    फिर यही सोचता हूँ
    ख़ुदा ऐ ख़ुदा
    क्या ज़बाँ रेहन हो कर भी तेरी इताअत करेगी
    क्या क़लम बिक के भी नाम तेरा ही लेगा
    दूसरों को ख़ुदा मान कर
    वो न करने लगें मा-सिवा की भी हम्द-ओ-सना
    ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा है दुआ
    आख़िरी साँस तक
    ये क़लम ये ज़बाँ
    लिखते रहते हैं ला-इलाहा
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    Waheed Akhtar
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    करम-ख़ुर्दा काग़ज़ों के ढेर में मदफ़ून है
    चाटता है हर्फ़ हर्फ़

    दाएरे क़ौसैन सन तारीख़ आदाद ओ शुमार
    नुक़्ता ओ ज़ेर-ओ-ज़बर तश्दीद ओ मद

    हासिल-ए-बीनाई ओ ज़ौक़-ए-नज़र
    बाँधता है वहम ओ तख़मीन ओ गुमाँ के कुछ हिसार

    चूमता है कतबा-ए-लौह-ए-मज़ार
    चंद नुक़्ते उड़ गए हैं लफ़्ज़ कुछ कावाक हैं

    उस की नज़रों में ख़ज़ीना इल्म का ख़ार ओ ख़स-ओ-ख़ाशाक हैं
    क्या अलाएम क्या रुमूज़ इश्काल अल्फ़ाज़ ओ हुरूफ़

    आतिश-ए-तग़ईर के हाथों पिघल जाते हैं सब
    वक़्त की भट्टी में तप कर इक नए साँचे में ढल जाते हैं सब

    लम्हा लम्हा मुन्कशिफ़ होता हुआ सर-ए-हयात
    मुंजमिद अल्फ़ाज़ के सीने में अपना नूर फैलाता नहीं

    करम-ख़ुर्दा काग़ज़ों की लाश में
    ख़ूँ अपना दौड़ाता नहीं

    करम-काग़ज़ है हरीफ़-ए-रोज़-ओ-शब
    चाटता है फ़ुज़्ल-ए-इल्म-ओ-अदब

    और सर अकड़ाए ख़ल्लाक़ान-ए-मअ'नी की तरफ़ ख़ंदा-ब-लब
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    Waheed Akhtar
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    दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है
    जब से तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद नहीं है

    अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़ के खुलते नहीं अस्बाब
    क्या बात भुला बैठे हैं क्या याद नहीं है

    हम दिल-ज़दगाँ जीते हैं यादों के सहारे
    हाँ मिट गए जिस पर वो अदा याद नहीं है

    घर अपना तो भूली ही थी आशुफ़्तगी-ए-दिल
    ख़ुद-रफ़्ता को अब दर भी तिरा याद नहीं है

    लेते हैं तिरा नाम ही यूँ जागते सोते
    जैसे कि हमें अपना ख़ुदा याद नहीं है

    ये एक ही एहसान-ए-ग़म दोस्त है क्या कम
    बे-मेहरी-ए-दौराँ की जफ़ा याद नहीं है

    बे-बरसे गुज़र जाते हैं उमडे हुए बादल
    जैसे उन्हें मेरा ही पता याद नहीं है

    इस बार 'वहीद' आप की आँखें नहीं बरसीं
    क्या झूमती ज़ुल्फ़ों की घटा याद नहीं है
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    Waheed Akhtar
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    हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने
    ख़ाक में मिल के भी ख़ाक-ए-रह-ए-मय-खाना बने

    कौन इस बज़्म में समझेगा ग़म-ए-दिल की ज़बाँ
    बात छोटी सी जब अफ़्साना-दर-अफ़्साना बने

    संग-अंदाज़ों से ऊँचा है बहुत अपना मक़ाम
    वर्ना मुमकिन था निशाना सर-ए-दीवाना बने

    शहर-ए-जानाँ से भी हम लाए मोहब्बत का ख़िराज
    क्या ज़रूरी है कि याँ वज़-ए-गदायाना बने

    वहशत आमादा-ए-रुसवाई है बे-ख़ौफ़ जहाँ
    ज़ब्त का है ये तक़ाज़ा कि तमाशा न बने

    ज़िंदगी हम तिरे इतने तो ख़ता-वार न थे
    कि जिसे अपना बनाएँ वही बेगाना बने

    इक तमन्ना कोई ऐसा तो बड़ा जुर्म न थी
    आँख ता-मर्ग छलकता हुआ पैमाना बने

    क्या रिफ़ाक़त है यही ऐ दिल-ए-आशुफ़्ता-मिज़ाज
    देख हम एक तिरे वास्ते क्या क्या न बने

    अजनबी लगते हैं हम अपनी नज़र को ख़ुद ही
    आप अपने से न इतना कोई बेगाना बने

    हम पे इक उम्र से तारी है ख़मोशी ऐसी
    एक नक़्शे पे सिमट जाए तो अफ़्साना बने

    ऐ मिरे हौसला-ए-ग़म है यही वक़्त-ए-वफ़ा
    ज़हर ही हासिल-ए-सद-उम्र-ए-तमन्ना न बने

    ज़िंदगी करने के अंदाज़ तो भूलो न 'वहीद'
    तुम ने क्या सीखा अगर इश्क़ सलीक़ा न बने
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    Waheed Akhtar
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    हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना
    सुब्ह-ए-दीदार का भी शाम मिला हो जाना

    पहले इतना न परागंदा मिज़ाज-ए-दिल था
    बे-सबब हँसना तो बे-वजह ख़फ़ा हो जाना

    जी के बहलाने को दुनिया में सहारे हैं बहुत
    साज़गार आए तुम्हें हम से जुदा हो जाना

    हम हैं शम्अ'-ए-सर-ए-बाद और हो तुम मौज-ए-हवा
    घूमने फिरने इधर को भी ज़रा हो जाना

    हम हैं महरूम रहे दामन-ए-गुल-चीं-आबाद
    अपनी तक़दीर में था बू-ए-वफ़ा हो जाना

    कितनी फ़रियादों के लब सी के ज़बाँ पाई 'वहीद'
    खेल समझे न कोई नग़्मा-सरा हो जाना
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    Waheed Akhtar
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    हम को मंज़ूर तुम्हारा जो न पर्दा होता
    सारा इल्ज़ाम सर अपने ही न आया होता

    दोस्त-अहबाब भी बे-गाने नज़र आते हैं
    काश इक शख़्स को इतना भी न चाहा होता

    मुफ़्त माँगा था किसी ने सो उसे बख़्श दिया
    ऐसा सस्ता भी न था दिल जिसे बेचा होता

    जान कर हम ने किया ख़ुद को ख़राब-ओ-रुसवा
    वर्ना हम वो थे फ़रिश्तों ने भी पूजा होता

    अहल-ए-दुनिया को बहुत हम से भी उम्मीदें थीं
    ज़िंदगी तुझ से मगर अपना न झगड़ा होता

    नासेहो हम को भी अंजाम-ए-जुनूँ है मालूम
    उस को समझाओ जो ये सब न समझता होता

    वो ख़िरद-मंद वो बाहोश 'वहीद' आज कहाँ
    मिलने वालों से कभी तुम ने ये पूछा होता
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    Waheed Akhtar
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    रात भर ख़्वाब के दरिया में सवेरा देखा
    दिन के साहिल पे जो उतरे तो अंधेरा देखा

    ख़ुद को लिक्खा भी है मैं ने ही मिटाया भी है ख़ुद
    क़लम-ए-ग़ैर ने साया भी न मेरा देखा

    जिन के चेहरों पे चमक नूर का हाला अतराफ़
    उन के ज़ेहनों को जो खोला तो अंधेरा देखा

    जिन के तेशों को रहा कोह-कनी का दावा
    उन्हें महलों का भी करते हुए फेरा देखा

    जो मुझे देने को आते थे ग़म अपने अक्सर
    उन की ख़ुशियों ने कभी घर भी न मेरा देखा

    उम्र कुल गुज़री थी पढ़ते हुए चेहरा तेरा
    आज ढूँडा तो कहीं अक्स न तेरा देखा

    जो मुझे बर्ग-ए-ख़िज़ाँ समझी थीं उन आँखों ने
    नाम औराक़-ए-बहाराँ पे भी मेरा देखा
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    Waheed Akhtar
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    दफ़्तर-ए-लौह ओ क़लम या दर-ए-ग़म खुलता है
    होंट खुलते हैं तो इक बाब-ए-सितम खुलता है

    हर्फ़-ए-इंकार है क्यूँ नार-ए-जहन्नम का हलीफ़
    सिर्फ़ इक़रार पे क्यूँ बाब-ए-इरम खुलता है

    आबरू हो न जो प्यारी तो ये दुनिया है सख़ी
    हाथ फैलाओ तो ये तर्ज़-ए-करम खुलता है

    माँगने वालों को क्या इज़्ज़त ओ रुस्वाई से
    देने वालों की अमीरी का भरम खुलता है

    बंद आँखें रहीं मेला है लुटेरों का लगा
    अश्क लुट जाते हैं जब दीदा-ए-नम खुलता है

    जान देने में जो लज़्ज़त है बचाने में कहाँ
    दिल किसी से जो बंधे उक़्दा-ए-ग़म खुलता है

    साथ रहता है सदा महफ़िल ओ तन्हाई में
    दिल-ए-रम-ख़ुरदा मगर हम से भी कम खुलता है

    देखो पस्ती से तो हर एक बुलंदी है राज़
    जादा-ए-कोह फ़क़त ज़ेर-ए-क़दम खुलता है

    क़र्ज़ अदा करना है जाँ का तो चलो मक़्तल में
    खिंच गई बाग बजा तब्ल-ओ-अलम खुलता है
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    Waheed Akhtar
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    तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए
    मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए

    उम्र भर मिलते रहे फिर भी न मिलने पाए
    इस तरह मिल कि मुलाक़ात मुकम्मल हो जाए

    दिन में बिखरा हूँ बहुत रात समेटेगी मुझे
    तू भी आ जा तो मिरी ज़ात मुकम्मल हो जाए

    नींद बन कर मिरी आँखों से मिरे ख़ूँ में उतर
    रत-जगा ख़त्म हो और रात मुकम्मल हो जाए

    मैं सरापा हूँ दुआ तू मिरा मक़्सूद-ए-दुआ
    बात यूँ कर कि मिरी बात मुकम्मल हो जाए

    अब्र आँखों से उठे हैं तिरा दामन मिल जाए
    हुक्म हो तेरा तो बरसात मुकम्मल हो जाए

    तिरे सीने से मिरे सीने में आयात उतरें
    सूरा-ए-कश्फ़-ओ-करामात मुकम्मल हो जाए

    तेरे लब मोहर लगा दें तो ये क़िस्सा हो तमाम
    दफ़्तर-ए-तूल-ए-शिकायात मुकम्मल हो जाए

    तुझ को पाए तो 'वहीद' अपने ख़ुदा को पा ले
    काविश-ए-मअर्फ़त-ए-ज़ात मुकम्मल हो जाए
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    Waheed Akhtar
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    अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे
    सुकूत ऐसा नहीं है जो कुछ सुनाई न दे

    जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी
    न सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई न दे

    जो देखना हो तो आईना-ख़ाना है ये सुकूत
    हो आँख बंद तो इक नक़्श भी दिखाई न दे

    ये रूहें इस लिए चेहरों से ख़ुद को ढाँपे हैं
    मिले ज़मीर तो इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दे

    कुछ ऐसे लोग भी तन्हा हुजूम में हैं छुपे
    कि ज़िंदगी उन्हें पहचान कर दुहाई न दे

    हूँ अपने-आप से भी अजनबी ज़माने के साथ
    अब इतनी सख़्त सज़ा दिल की आश्नाई न दे

    सभी के ज़ेहन हैं मक़रूज़ क्या क़दीम ओ जदीद
    ख़ुद अपना नक़्द-ए-दिल-ओ-जां कहीं दिखाई न दे

    बहुत है फ़ुर्सत-ए-दीवानगी की हसरत भी
    'वहीद' वक़्त गर इज़्न-ए-ग़ज़ल-सराई न दे
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    Waheed Akhtar
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