तराना-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ है हर ख़ुशी अपनी
कि एक दर्द-ए-मुसलसल है ज़िंदगी अपनी
कि एक दर्द-ए-मुसलसल है ज़िंदगी अपनी
बहल न जाए कहीं ये दिल-ए-ख़िज़ाँ-मानूस
बहार आ के दिखाती है दिलकशी अपनी
किसी के चेहरा-ए-ज़ेबास उस को क्या निस्बत
यूँही बिखेरा करे चाँद चाँदनी अपनी
शुऊ'र-ए-चाक-ए-गरेबाँ किधर है दामन-ए-यार
जुनूँ की हद से मिली जा के आशिक़ी अपनी
बता कि ये भी कोई शान-ए-बे-नियाज़ी है
सुनी न हाए कोई तू ने गुफ़्तनी अपनी
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अपनी हस्ती को यहाँ बे-मुद्दआ समझा था मैं
क्या समझना चाहिए था और क्या समझा था मैं
क्या समझना चाहिए था और क्या समझा था मैं
तुम को अपने दर्द-ए-दिल की गर दवा समझा था मैं
क्या ग़लत समझा था मैं बिल्कुल बजा समझा था मैं
किस ग़लत-फ़हमी में अपनी उम्र सारी कट गई
इक वफ़ा-ना-आश्ना को बा-वफ़ा समझा था मैं
कुछ न पूछो राह-ए-उल्फ़त में मिरी वामांदगी
काकुल-ए-पेचीदा को ज़ंजीर-ए-पा समझा था मैं
उस का हर हर घूँट था ज़हर-ए-हलाहल से सिवा
ज़िंदगी को चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा समझा था मैं
सच है 'नजमी' इश्क़ अज़ीं बिसयार करदस्त-ओ-कुनद
सर का देना एक आईन-ए-वफ़ा समझा था मैं
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गुल खिलाए उस ने क्या क्या बाग़ में
फिर भी किस दर्जा सबा ख़ामोश है
आरज़ू जिन की थी मुझ को मिल गए
अब ज़बान-ए-इल्तिजा ख़ामोश है
बे-कसी ये किस ने ली तेरी पनाह
गोर का किस की दिया ख़ामोश है
शोरिश-ए-दिल शोरिश-ए-महशर नहीं
ज़िंदगी अपनी भी क्या ख़ामोश है
सोचती है जा के ये बरसे कहाँ
मेरे अश्कों की घटा ख़ामोश है
किस को जीने की तमन्ना है यहाँ
क्यूँ लब-ए-मोजिज़-नुमा ख़ामोश है
हुस्न-ए-दिलकश का भी क्या अंदाज़ है
नाज़ गोया है अदा ख़ामोश है
है यहाँ 'नजमी' उसी का शोर-ओ-ग़ुल
गो ब-ज़ाहिर वो सदा ख़ामोश है
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उम्मीद की शमएँ रह रह कर मैं दिल में जलाता जाता हूँ
जब जल चुकती हैं ये शमएँ फिर सब को बुझाता जाता हूँ
तुम देख रहे हो मयख़ाने में जुरअत-ए-रिंदाना मेरी
मैं ख़ुद भी पीता जाता हूँ तुम को भी पिलाता जाता हूँ
तकमील-ए-मोहब्बत करता हूँ कुछ गर्मी से कुछ नर्मी से
आहें भी भरता जाता हूँ आँसू भी बहाता जाता हूँ
बे-कार सही नाले मेरे बे-सूद सही आहें मेरी
मैं उन की निगाहों में लेकिन फिर भी तो समाता जाता हूँ
हाँ साज़-ए-शिकस्ता में मेरे नग़्मों का तलातुम पिन्हाँ है
शोरीदा-नवाई से अपनी महफ़िल पर छाता जाता हूँ
मैं सई-ए-मुसलसल कर के भी मंज़िल से कोसों दूर रहा
मंज़िल न मिली तो क्या है मगर अपने को पाता जाता हूँ
उम्मीद-ए-वफ़ा के पेश-ए-नज़र मैं उन की जफ़ाएँ भूल गया
है मुस्तक़बिल पर आँख मिरी माज़ी को भुलाता जाता हूँ
क़ुदरत भी मुहय्या करती है अब मेरे लिए इबरत के सबक़
हर गाम पे ठोकर खाता हूँ और होश में आता जाता हूँ
'नजमी' ये ख़मोशी भी मेरी कुछ वज्ह-ए-सुकून-ए-दिल न हुई
मैं ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ से दर्द को अपने और बढ़ाता जाता हूँ
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इन आँसुओं की तुम को हक़ीक़त बताएँ क्या
आँखें हैं मेरी शौकत-ए-तूफ़ाँ लिए हुए
रंज-ए-फ़िराक़ भी है नशात-ए-विसाल भी
हूँ साथ साथ दर्द के दरमाँ लिए हुए
आसाँ नहीं विसाल तो दुश्वार भी नहीं
मुश्किल में हूँ ये मुश्किल-ए-आसाँ लिए हुए
रहमत ने लूट लूट लिया मुझ को हश्र में
पहुँचा जो मैं बिज़ाअ'त-ए-इस्याँ लिए हुए
यारब हो ख़ैर आमद-ए-फ़स्ल बहार की
दस्त-ए-जुनूँ है चाक-ए-गरेबाँ लिए हुए
'नजमी' हमारी चश्म-ए-बसीरत के वास्ते
है गुल की पंखुड़ी भी गुलिस्ताँ लिए हुए
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मजबूर-ए-नुमाइश नहीं कुछ हुस्न ही उन का
हम भी तो हैं मजबूर तक़ाज़ा-ए-नज़र से
बिछड़ा हुआ जैसे कोई मिलते ही लिपट जाए
यूँ तीर तिरा आ के लिपटता है जिगर से
कटते नहीं क्यूँ शाम-ए-जुदाई के ये लम्हे
मिलती नहीं क्यूँ ज़ुल्मत-ए-शब जा के सहरस
करना है किसी दिन उसे हम-दोश-ए-सुरय्या
है आह अभी तक मिरी महरूम असर से
हो जाएँ हमेशा के लिए आप जो मेरे
मैं माँग लूँ कुछ उम्र यहाँ उम्र-ए-ख़िज़र से
ऐसा तो न कर पाएगा कोई भी फ़ुसूँ-कार
वो कर गए जो सादगी-ए-हुस्न-ए-नज़र से
आसूदा-ए-मंज़िल नहीं आगाह-ए-सऊबत
महरूम है वो लज़्ज़त-ए-दूरी-ए-सफ़र से
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जब कोई लेता है मेरे सामने नाम-ए-ग़ज़ल
याद आता है मुझे इक नाज़ुक-अंदाम-ए-ग़ज़ल
याद आता है मुझे इक नाज़ुक-अंदाम-ए-ग़ज़ल
उस हरीम-ए-नाज़ उस ख़लवत-सरा-ए-राज़ में
बारहा जज़्बात ने बाँधा है एहराम-ए-ग़ज़ल
एक रश्क-ए-माह का मैं कर रहा हूँ तज़्किरा
आसमाँ से क्यूँ न हो ऊँचा मिरा बाम-ए-ग़ज़ल
मय-कदा भी गूँज उट्ठा शोर-ए-नोशा-नोश से
किस क़दर है कैफ़-आवर ये मिरा जाम-ए-ग़ज़ल
नौ-ब-नौ ताज़ा-ब-ताज़ा जलवा-ए-शादाब-ए-हुस्न
कर सके किस तरह आख़िर कोई इत्माम-ए-ग़ज़ल
अक्स-ए-ज़न हो जिस के दिल में परतव-ए-रंगीन-ए-यार
कौन कह सकता है 'नजमी' उस को नाकाम-ए-ग़ज़ल
देखते हैं गोशा-ए-चश्म-ए-हया से वो मुझे
मिल रहा है आज 'नजमी' मुझ को इनआ'म-ए-ग़ज़ल
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निशान-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद पा कर भी न जो ठहरे
उसी रहरव को हम आसूदा-ए-मंज़िल समझते हैं
तिरे सहरा-नवर्दों का मज़ाक़-ए-जुस्तुजू तौबा
ग़ुबार-ए-राह को ये पर्दा-ए-महमिल समझते हैं
तुम्हीं से है ये नूर-ए-शम्अ' और ये सोज़-ए-परवाना
तुम्हीं को अहल-ए-महफ़िल रौनक़-ए-महफ़िल समझते हैं
न दुनिया बाइ'स-ए-ग़फ़लत न उक़्बा वज्ह-ए-हुश्यारी
रहे जो तुझ से ग़ाफ़िल हम उसे ग़ाफ़िल समझते हैं
यहाँ तो क़ाब़िल-ए-अफ़सोस हैं दुश्वारियाँ उन की
तुम्हारी राह में मुश्किल को जो मुश्किल समझते हैं
उन्हीं को तेरे तीर-ए-नीम-कश का लुत्फ़ आता है
न सीने को जो सीना और न दिल को दिल समझते हैं
गुल-ए-मक़्सूद से फिर क्यूँ उसे वो भर नहीं देते
मिरे दामन को जब वो कासा-ए-साइल समझते हैं
कोई समझे न समझे इस हक़ीक़त को मगर 'नजमी'
हम अपने दर्द-ए-दिल को इश्क़ का हासिल समझते हैं
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जो पूछते हैं कि ये इश्क़-ओ-आशिक़ी क्या है
वो जानते नहीं मक़्सूद-ए-ज़िंदगी क्या है
वो जानते नहीं मक़्सूद-ए-ज़िंदगी क्या है
ज़मीर-ए-पाक ख़याल-ए-बुलंद ज़ौक़-ए-लतीफ़
बस और इस के सिवा जौहर-ए-ख़ुदी क्या है
वफ़ा की आड़ में क्या क्या हुई जफ़ा हम पर
जो दोस्ती यही ठहरी तो दुश्मनी क्या है
बजा है फ़र्त-ए-जुनूँ ने हमें किया रुस्वा
जमाल-ए-यार में आख़िर ये दिलकशी क्या है
वुफ़ूर-ए-शौक़ की मायूसियाँ अरे तौबा
दिल-ए-तबाह में अब आरज़ू रही क्या है
अगर न जुर्म-ए-मोहब्बत की ये सज़ा होती
तो बात बात पे हम से ये बे-रुख़ी क्या है
न समझो तुम मिरी अर्ज़-ए-नियाज़ को शिकवा
मैं जानता हूँ तक़ाज़ा-ए-बंदगी क्या है
अता किया था जो ज़ौक़-ए-नुमूद उस दिल को
तो हर क़दम पे ये रंग-ए-शिकस्तगी क्या है
गुरेज़ क्या मैं करूँ नासेहो की सोहबत से
जहाँ न कुछ हो ये सोहबत वहाँ बुरी क्या है
वफ़ा से और न तर्क-ए-वफ़ा से आप हैं ख़ुश
मुझे बताइए फिर आप की ख़ुशी क्या है
फ़रेब-ए-हस्ती-ए-मौहूम खा रहा हूँ हनूज़
मुझे ख़बर है हक़ीक़त यहाँ मिरी क्या है
जो गामज़न हैं सर-ए-जादा-ए-तलब 'नजमी'
वो जानते नहीं दुनिया में बेबसी क्या है
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जब दिल ही नहीं है पहलू में फिर इश्क़ का सौदा कौन करे
अब उन से मोहब्बत कौन करे अब उन की तमन्ना कौन करे
अब उन से मोहब्बत कौन करे अब उन की तमन्ना कौन करे
अब हिज्र के सद
में सहने को पत्थर का कलेजा कौन करे
इन लंबी लंबी रातों का मर मर के सवेरा कौन करे
हम रस्म-ए-वफ़ा को मानते हैं आदाब-ए-मोहब्बत जानते हैं
हम बात की तह पहचानते हैं फिर आप को रुस्वा कौन करे
ऐ जज़्बा-ए-उल्फ़त तू ही बता कुछ हद भी है इस नाकामी की
मायूस निगाहों से उन का महफ़िल में नज़ारा कौन करे
हम देख चुके हाँ देख चुके दस्तूर तुम्हारी महफ़िल का
जब शुक्र पे ये पाबंदी है फिर जुरअत-ए-शिकवा कौन करे
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