Amjad Najmi

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Amjad Najmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amjad Najmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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आशुफ़्ता-नवाई से अपनी दुनिया को जगाता जाता हूँ दीवाना हूँ दीवानों को मैं होश में लाता जाता हूँ उम्मीद की शमएँ रह रह कर मैं दिल में जलाता जाता हूँ जब जल चुकती हैं ये शमएँ फिर सब को बुझाता जाता हूँ तुम देख रहे हो मयख़ाने में जुरअत-ए-रिंदाना मेरी मैं ख़ुद भी पीता जाता हूँ तुम को भी पिलाता जाता हूँ तकमील-ए-मोहब्बत करता हूँ कुछ गर्मी से कुछ नर्मी से आहें भी भरता जाता हूँ आँसू भी बहाता जाता हूँ बे-कार सही नाले मेरे बे-सूद सही आहें मेरी मैं उन की निगाहों में लेकिन फिर भी तो समाता जाता हूँ हाँ साज़-ए-शिकस्ता में मेरे नग़्मों का तलातुम पिन्हाँ है शोरीदा-नवाई से अपनी महफ़िल पर छाता जाता हूँ मैं सई-ए-मुसलसल कर के भी मंज़िल से कोसों दूर रहा मंज़िल न मिली तो क्या है मगर अपने को पाता जाता हूँ उम्मीद-ए-वफ़ा के पेश-ए-नज़र मैं उन की जफ़ाएँ भूल गया है मुस्तक़बिल पर आँख मिरी माज़ी को भुलाता जाता हूँ क़ुदरत भी मुहय्या करती है अब मेरे लिए इबरत के सबक़ हर गाम पे ठोकर खाता हूँ और होश में आता जाता हूँ 'नजमी' ये ख़मोशी भी मेरी कुछ वज्ह-ए-सुकून-ए-दिल न हुई मैं ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ से दर्द को अपने और बढ़ाता जाता हूँ — Amjad Najmi
मुझे दैर भी हो क्यूँँ कर न हरम की तरह प्यारा तू यहाँ भी जल्वा-आरा तू वहाँ भी जल्वा-आरा है अजीब ये तमाशा है अजीब ये नज़ारा मिरी आहों का शरारा मिरे आँसुओं का धारा वो पयाम-ए-शाम-ए-ग़म हो कि नवेद-ए-सुब्ह-ए-इशरत मुझे ये भी है गवारा मुझे वो भी है गवारा यूँँही मुझ को डूबने दो इन्हीं मौज-हा-ए-ग़म में कि मुहीत-ए-ग़म का शायद अभी दूर है किनारा न फ़रोग़-ए-रू-ए-ताबाँ न निगाह-ए-नूर-अफ़्शाँ मिरे इज़्तिराब-ए-दिल से मिरा राज़ आश्कारा कोई क्या समझ सकेगा ये है फ़ैज़-ए-इश्क़ जिस ने मुझे इस तरह बिगाड़ा मुझे इस तरह सँवारा कोई चीज़ भी है क़िस्मत कोई शय भी है मुक़द्दर कि मैं अपनी कोशिशों में यहाँ बार-बार हारा ये हुजूम-ए-ना-उमीदी ये वुफ़ूर-ए-ना-मुरादी हूँ अजब मुसीबतों में मैं मुसीबतों का मारा मुझे इल्म इस का क्या था मुझे क्या ख़बर थी 'नजमी' कि मुझी को फूँक देगा मिरे इश्क़ का शरारा — Amjad Najmi
कितना मुख़्तसर है ये ज़िंदगी का अफ़्साना एक गाम-ए-मर्दाना एक रक़्स-ए-मस्ताना तू ही एक शाकी है ज़ौक़-ए-तिश्ना-कामी का ग़र्क़-ए-मौज-ए-सहबा है जबकि सारा मय-ख़ाना बस यही है ले दे के दूरी-ए-रह-ए-मंज़िल दो क़दम दिलेराना दो क़दम शिताबाना हक़ तुझे है क्या हासिल ज़ेर-ए-चर्ख़ जीने का हादसात-ए-आलम से तू अगर है बेगाना दिल नहीं वो सीने में एक संग-ए-ख़ारा है हो न जिस में पोशीदा आह-ए-दर्द-मंदाना ये भी एक धोका है दीदा-ए-ग़लत-बीं का वर्ना कौन दीवाना और कौन फ़रज़ाना गाह गाह लड़ता रह अक़्ल-ए-मस्लहत-बीं से गाह गाह लेता जा हाथ में भी पैमाना — Amjad Najmi
जाएँ कहाँ हम आप का अरमाँ लिए हुए दर्द-ए-फ़िराक़-ओ-काविश-ए-हिज्राँ लिए हुए इन आँसुओं की तुम को हक़ीक़त बताएँ क्या आँखें हैं मेरी शौकत-ए-तूफ़ाँ लिए हुए रंज-ए-फ़िराक़ भी है नशात-ए-विसाल भी हूँ साथ साथ दर्द के दरमाँ लिए हुए आसाँ नहीं विसाल तो दुश्वार भी नहीं मुश्किल में हूँ ये मुश्किल-ए-आसाँ लिए हुए रहमत ने लूट लूट लिया मुझ को हश्र में पहुँचा जो मैं बिज़ाअ'त-ए-इस्याँ लिए हुए यारब हो ख़ैर आमद-ए-फ़स्ल बहार की दस्त-ए-जुनूँ है चाक-ए-गरेबाँ लिए हुए 'नजमी' हमारी चश्म-ए-बसीरत के वास्ते है गुल की पंखुड़ी भी गुलिस्ताँ लिए हुए — Amjad Najmi
जब कोई लेता है मेरे सामने नाम-ए-ग़ज़ल याद आता है मुझे इक नाज़ुक-अंदाम-ए-ग़ज़ल उस हरीम-ए-नाज़ उस ख़लवत-सरा-ए-राज़ में बारहा जज़्बात ने बाँधा है एहराम-ए-ग़ज़ल एक रश्क-ए-माह का मैं कर रहा हूँ तज़्किरा आसमाँ से क्यूँँ न हो ऊँचा मिरा बाम-ए-ग़ज़ल मय-कदा भी गूँज उट्ठा शोर-ए-नोशा-नोश से किस क़दर है कैफ़-आवर ये मिरा जाम-ए-ग़ज़ल नौ-ब-नौ ताज़ा-ब-ताज़ा जलवा-ए-शादाब-ए-हुस्न कर सके किस तरह आख़िर कोई इत्माम-ए-ग़ज़ल अक्स-ए-ज़न हो जिस के दिल में परतव-ए-रंगीन-ए-यार कौन कह सकता है 'नजमी' उस को नाकाम-ए-ग़ज़ल देखते हैं गोशा-ए-चश्म-ए-हया से वो मुझे मिल रहा है आज 'नजमी' मुझ को इनआ'म-ए-ग़ज़ल — Amjad Najmi
जो पूछते हैं कि ये इश्क़-ओ-आशिक़ी क्या है वो जानते नहीं मक़्सूद-ए-ज़िंदगी क्या है ज़मीर-ए-पाक ख़याल-ए-बुलंद ज़ौक़-ए-लतीफ़ बस और इस के सिवा जौहर-ए-ख़ुदी क्या है वफ़ा की आड़ में क्या क्या हुई जफ़ा हम पर जो दोस्ती यही ठहरी तो दुश्मनी क्या है बजा है फ़र्त-ए-जुनूँ ने हमें किया रुस्वा जमाल-ए-यार में आख़िर ये दिलकशी क्या है वुफ़ूर-ए-शौक़ की मायूसियाँ अरे तौबा दिल-ए-तबाह में अब आरज़ू रही क्या है अगर न जुर्म-ए-मोहब्बत की ये सज़ा होती तो बात बात पे हम से ये बे-रुख़ी क्या है न समझो तुम मिरी अर्ज़-ए-नियाज़ को शिकवा मैं जानता हूँ तक़ाज़ा-ए-बंदगी क्या है अता किया था जो ज़ौक़-ए-नुमूद उस दिल को तो हर क़दम पे ये रंग-ए-शिकस्तगी क्या है गुरेज़ क्या मैं करूँँ नासेहो की सोहबत से जहाँ न कुछ हो ये सोहबत वहाँ बुरी क्या है वफ़ा से और न तर्क-ए-वफ़ा से आप हैं ख़ुश मुझे बताइए फिर आप की ख़ुशी क्या है फ़रेब-ए-हस्ती-ए-मौहूम खा रहा हूँ हनूज़ मुझे ख़बर है हक़ीक़त यहाँ मिरी क्या है जो गामज़न हैं सर-ए-जादा-ए-तलब 'नजमी' वो जानते नहीं दुनिया में बेबसी क्या है — Amjad Najmi
नहीं कुछ इंतिहा अफ़्सुर्दगी की यही है रस्म शायद आशिक़ी की लब-ए-लालीं पे ये लहरें हँसी की यही डूबे न कश्ती ज़िंदगी की ढले आँसू कि ये टूटे सितारे सुकूत शब में याद आई किसी की चमन में बूटा बूटा देखता है अदाएँ इन की मस्ताना रवी की बढ़ाए जा क़दम ज़ौक़ तलब में शिकायत कर न इज्ज़-ओ-ख़स्तगी की इसी का नाम शायद ज़िंदगी है ख़ुशी की इक घड़ी तो इक ग़मी की सुकून-ए-साहिल-ए-दरिया का अरमाँ करो बातें न ये कम-हिम्मती की मिला कर आँख फिर आँखें चुराना अदा-ए-ख़ास है ये दिलबरी की अता हो तो अता हो दर्द ऐसा हो लज़्ज़त जिस में सोज़-ए-दाइमी की अभी है नूर-ओ-ज़ुल्मत की कशाकश अभी है दूर मंज़िल आगही की हयात-ए-चंद-रोज़ा अपनी 'नजमी' है तस्वीर-ए-मुजस्सम बेबसी की — Amjad Najmi
सुब्ह-दम आया तो क्या हंगाम-ए-शाम आया तो क्या तू मिरी नाकामियों के बा'द काम आया तो क्या इल्तिफ़ात-ए-अव्वलीं की बात ही कुछ और है मुझ तक उन की बज़्म में अब दौर-ए-जाम आया तो क्या ताक़त-ए-नज़्ज़ारा जब मिन्नत-पज़ीर-ए-होश हो बहर-जल्वा फिर कोई बाला-ए-बाम आया तो क्या शोरिश-ए-हंगामा-ए-मंसूर की तज्दीद है क़त्ल को मेरे वो बा-ईं एहतिमाम आया तो क्या अब कहाँ वो फ़स्ल-ए-गुल और अब कहाँ जोश-ए-बहार बहर-ए-गुल-गश्त-ए-चमन वो ख़ुश-ख़िराम आया तो क्या ऐ हुजूम-ए-ना-मुरादी ऐ वुफ़ूर-ए-यास-ओ-ग़म इश्क़ में कुछ लुत्फ़-ए-सई-ए-ना-तमाम आया तो क्या जब गरेबाँ में हमारे तार तक बाक़ी नहीं फिर अगर सुब्ह-ए-बहाराँ का पयाम आया तो क्या आरज़ू-ए-दिल अभी तक तिश्ना-ए-तफ़्सीर है तुझ को 'नजमी' शेवा-ए-हुस्न-ए-कलाम आया तो क्या — Amjad Najmi
बुलबुल-ए-रंगीं-नवा ख़ामोश है बाग़ की सारी फ़ज़ा ख़ामोश है गुल खिलाए उस ने क्या क्या बाग़ में फिर भी किस दर्जा सबा ख़ामोश है आरज़ू जिन की थी मुझ को मिल गए अब ज़बान-ए-इल्तिजा ख़ामोश है बे-कसी ये किस ने ली तेरी पनाह गोर का किस की दिया ख़ामोश है शोरिश-ए-दिल शोरिश-ए-महशर नहीं ज़िंदगी अपनी भी क्या ख़ामोश है सोचती है जा के ये बरसे कहाँ मेरे अश्कों की घटा ख़ामोश है किस को जीने की तमन्ना है यहाँ क्यूँँ लब-ए-मोजिज़-नुमा ख़ामोश है हुस्न-ए-दिलकश का भी क्या अंदाज़ है नाज़ गोया है अदा ख़ामोश है है यहाँ 'नजमी' उसी का शोर-ओ-ग़ुल गो ब-ज़ाहिर वो सदा ख़ामोश है — Amjad Najmi
जब दिल ही नहीं है पहलू में फिर इश्क़ का सौदा कौन करे अब उन से मोहब्बत कौन करे अब उन की तमन्ना कौन करे अब हिज्र के सद में सहने को पत्थर का कलेजा कौन करे इन लंबी लंबी रातों का मर मर के सवेरा कौन करे हम रस्म-ए-वफ़ा को मानते हैं आदाब-ए-मोहब्बत जानते हैं हम बात की तह पहचानते हैं फिर आप को रुस्वा कौन करे ऐ जज़्बा-ए-उल्फ़त तू ही बता कुछ हद भी है इस नाकामी की मायूस निगाहों से उन का महफ़िल में नज़ारा कौन करे हम देख चुके हाँ देख चुके दस्तूर तुम्हारी महफ़िल का जब शुक्र पे ये पाबंदी है फिर जुरअत-ए-शिकवा कौन करे — Amjad Najmi
तुम जल्वा दिखाओ तो ज़रा पर्दा-ए-दर से हम थक गए नज़्ज़ारा-ए-ख़ुरशीद-ओ-क़मर से मजबूर-ए-नुमाइश नहीं कुछ हुस्न ही उन का हम भी तो हैं मजबूर तक़ाज़ा-ए-नज़र से बिछड़ा हुआ जैसे कोई मिलते ही लिपट जाए यूँँ तीर तिरा आ के लिपटता है जिगर से कटते नहीं क्यूँँ शाम-ए-जुदाई के ये लम्हे मिलती नहीं क्यूँँ ज़ुल्मत-ए-शब जा के सहरस करना है किसी दिन उसे हम-दोश-ए-सुरय्या है आह अभी तक मिरी महरूम असर से हो जाएँ हमेशा के लिए आप जो मेरे मैं माँग लूँ कुछ उम्र यहाँ उम्र-ए-ख़िज़र से ऐसा तो न कर पाएगा कोई भी फ़ुसूँ-कार वो कर गए जो सादगी-ए-हुस्न-ए-नज़र से आसूदा-ए-मंज़िल नहीं आगाह-ए-सऊबत महरूम है वो लज़्ज़त-ए-दूरी-ए-सफ़र से — Amjad Najmi
न कुछ आलिम समझते हैं न कुछ जाहिल समझते हैं मोहब्बत की हक़ीक़त को बस अहल-ए-दिल समझते हैं निशान-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद पा कर भी न जो ठहरे उसी रहरव को हम आसूदा-ए-मंज़िल समझते हैं तिरे सहरा-नवर्दों का मज़ाक़-ए-जुस्तुजू तौबा ग़ुबार-ए-राह को ये पर्दा-ए-महमिल समझते हैं तुम्हीं से है ये नूर-ए-शम्अ' और ये सोज़-ए-परवाना तुम्हीं को अहल-ए-महफ़िल रौनक़-ए-महफ़िल समझते हैं न दुनिया बाइ'स-ए-ग़फ़लत न उक़्बा वज्ह-ए-हुश्यारी रहे जो तुझ से ग़ाफ़िल हम उसे ग़ाफ़िल समझते हैं यहाँ तो क़ाब़िल-ए-अफ़सोस हैं दुश्वारियाँ उन की तुम्हारी राह में मुश्किल को जो मुश्किल समझते हैं उन्हीं को तेरे तीर-ए-नीम-कश का लुत्फ़ आता है न सीने को जो सीना और न दिल को दिल समझते हैं गुल-ए-मक़्सूद से फिर क्यूँँ उसे वो भर नहीं देते मिरे दामन को जब वो कासा-ए-साइल समझते हैं कोई समझे न समझे इस हक़ीक़त को मगर 'नजमी' हम अपने दर्द-ए-दिल को इश्क़ का हासिल समझते हैं — Amjad Najmi