सोज़ है दिल के दाग़ में अब तक

रौशनी है चराग़ में अब तक

ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं थी मेहरबाँ किस की
बू बसी है दिमाग़ में अब तक

तिश्ना-कामों को इस से क्या हासिल
मय धरी है अयाग़ में अब तक

हाए आवारगी-ए-बाद-ए-सबा
है ये किस के सुराग़ में अब तक

गो ख़िज़ाँ का भी दौर-दौरा है
फूल खिलते हैं बाग़ में अब तक

रोज़-ओ-शब मारे मारे फिरते हैं
हम तलाश-ए-फ़राग़ में अब तक

ये भी बुझ जाएगी कभी 'नजमी'
रौशनी है चराग़ में अब तक

— Amjad Najmi

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Gulshan Shayari

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