Meaning of

ख़िज़ाँ

khizaan • خزاں

पतझड़; अवनति

autumn; decline

خزاں; زوال

Persian

बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हो ही रही रुत आने जाने के लिए
शाख़-ए-निहाल-ए-ग़म हरी होगी ज़माने के लिए

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रंग अपने बदल ही गई है हवा
थामो आँचल कि चल ही गई है हवा

देखा उस ने जो हँसकर चमन की तरफ़
रुत ख़िज़ाँ की बदल ही गई है हवा

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ख़िज़ाँ को आता है कैसे बहार कर लेना
लहू के छींटो से काँटो को प्यार कर लेना

वो जो भी कह रहा है सच ही कह रहा होगा
हमारा काम है बस ऐतिबार कर लेना

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मौसम प' मिरा कोई इख़्तियार नहीं है
अब की ख़िज़ाँ के बा'द में बहार नहीं है

वा'दा लबों पे है जो निगाहों में नहीं है
बोसा तो दे दिया यूँँ मगर प्यार नहीं है

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तेरा बदन तो सलामत रहे मगर दिल को
मेरे इन अश्कों की बारिश के बा'द ज़ंग लगे

है इंतिक़ाम से मतलब मुझे तो रंग-ए-बहार
ये बद-दुआ है मेरी तू ख़िज़ाँ का रंग लगे

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कहो कि ये ख़िज़ाँ नहीं कहो कि ये बहार है
नज़र नज़र का खेल है नज़र का ही ये वार है

ख़ुदा भरेगा क़िस्त को ये टूटे दिल ख़रीदकर
ये इश्क़ की कहानियाँ उसी पे सब उधार है

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मेरी बुलबुल यहीं मौजूद रहना
ख़िज़ाँ को दूर ले कर जा रहा हूँ

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बन कर कभी बहार तो बन कर कभी ख़िज़ाँ
आबाद कर गए कभी बर्बाद कर गए

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वो मुझ सेे रूठ जाती है तो दिल मेरा ये कहता है
ख़िज़ाँ के बा'द आएँगी बहारें लौट कर इक दिन

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हसीन आँखों से इतने हसीन ख़्वाब न देख
ख़िज़ाँ की रुत में शजर पर नए गुलाब न देख

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बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हो ही रही रुत आने जाने के लिए
शाख़-ए-निहाल-ए-ग़म हरी होगी ज़माने के लिए

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रंग अपने बदल ही गई है हवा
थामो आँचल कि चल ही गई है हवा

देखा उस ने जो हँसकर चमन की तरफ़
रुत ख़िज़ाँ की बदल ही गई है हवा

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'ख़िज़ाँ' गिरते पत्तों और प्रकृति के कोमल क्षय की छवि जगाता है। कविता में, यह समय के प्रवाह, परिवर्तन की अनिवार्यता, और अंत में पाई जाने वाली सुंदरता का प्रतीक है।

कवि अक्सर 'ख़िज़ाँ' का उपयोग जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति पर विचार करने के लिए करते हैं। यह एक प्रकार की पुरानी यादों, विदाई की मधुर कड़वाहट, और जीवन के चक्रों की शांत स्वीकृति को व्यक्त कर सकता है।

'ख़िज़ाँ' अंत और आरंभ की फुसफुसाहट है, जीवन के शाश्वत नृत्य की कोमल याद दिलाता है।