Kaleem Aajiz

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    ग़म है तो कोई लुत्फ़ नहीं बिस्तर-ए-गुल पर
    जी ख़ुश है तो काँटों पे भी आराम बहुत है
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    तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या
    कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या

    तू रईस-ए-शहर-ए-सितम-गराँ मैं गदा-ए-कूचा-ए-आशिक़ाँ
    तू अमीर है तो बता मुझे मैं ग़रीब हूँ तो बुरा है क्या

    तू जफ़ा में मस्त है रोज़-ओ-शब मैं कफ़न-ब-दोश ग़ज़ल-ब-लब
    तिरे रोब-ए-हुस्न से चुप हैं सब मैं भी चुप रहूँ तो मज़ा है क्या

    ये कहाँ से आई है सुर्ख़-रू है हर एक झोंका लहू लहू
    कटी जिस में गर्दन-ए-आरज़ू ये उसी चमन की हवा है क्या
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    मिरा हाल पूछ के हम-नशीं मिरे सोज़-ए-दिल को हवा न दे
    बस यही दुआ मैं करूँ हूँ अब कि ये ग़म किसी को ख़ुदा न दे

    ये जो ज़ख़्म-ए-दिल को पकाए हम लिए फिर रहे हैं छुपाए हम
    कोई ना-शनास-ए-मिज़ाज-ए-ग़म कहीं हाथ उस को लगा न दे

    तू जहाँ से आज है नुक्ता-चीं कभी मुद्दतों में रहा वहीं
    मैं गदा-ए-राहगुज़र नहीं मुझे दूर ही से सदा न दे

    तब-ओ-ताब-ए-इश्क़ का है करम कि जमी है महफ़िल-ए-चश्म-ए-नम
    ज़रा देखियो ऐ हवा-ए-ग़म ये चराग़ कोई बुझा न दे

    वो जो शाइ'री का सबब हुआ वो मोआ'मला भी अजब हुआ
    मैं ग़ज़ल सुनाऊँ हूँ इस लिए कि ज़माना उस को भला न दे
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    वो सितम न ढाए तो क्या करे उसे क्या ख़बर कि वफ़ा है क्या?
    तू उसी को प्यार करे है क्यूँ ये 'कलीम' तुझ को हुआ है क्या?

    तुझे संग-दिल ये पता है क्या कि दुखे दिलों की सदा है क्या?
    कभी चोट तू ने भी खाई है कभी तेरा दिल भी दुखा है क्या?

    तू रईस-ए-शहर-ए-सितम-गराँ मैं गदा-ए-कूचा-ए-आशिक़ाँ
    तू अमीर है तो बता मुझे मैं ग़रीब हूँ तो बुरा है क्या?

    तू जफ़ा में मस्त है रोज़-ओ-शब मैं कफ़न-ब-दोश ओ ग़ज़ल-ब-लब
    तिरे रोब-ए-हुस्न से चुप हैं सब मैं भी चुप रहूँ तो मज़ा है क्या?

    ये कहाँ से आई है सुर्ख़-रू है हर एक झोंका लहू लहू
    कटी जिस में गर्दन-ए-आरज़ू ये उसी चमन की हवा है क्या?

    अभी तेरा दौर-ए-शबाब है अभी क्या हिसाब-ओ-किताब है
    अभी क्या न होगा जहान में अभी इस जहाँ में हुआ है क्या?

    यही हम-नवा यही हम-सुख़न यही हम-निशाँ यही हम-वतन
    मिरी शाइ'री ही बताएगी मिरा नाम क्या है पता है क्या?
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    ये समुंदर है किनारे ही किनारे जाओ
    इश्क़ हर शख़्स के बस का नहीं प्यारे जाओ

    यूँ तो मक़्तल में तमाशाई बहुत आते हैं
    आओ उस वक़्त कि जिस वक़्त पुकारे जाओ

    दिल की बाज़ी लगे फिर जान की बाज़ी लग जाए
    इश्क़ में हार के बैठो नहीं हारे जाओ

    काम बन जाए अगर ज़ुल्फ़-ए-जुनूँ बन जाए
    इस लिए इस को सँवारो कि सँवारे जाओ

    कोई रस्ता कोई मंज़िल इसे दुश्वार नहीं
    जिस जगह चाहो मोहब्बत के सहारे जाओ

    हम तो मिट्टी से उगाएँगे मोहब्बत के गुलाब
    तुम अगर तोड़ने जाते हो सितारे जाओ

    डूबना होगा अगर डूबना तक़दीर में है
    चाहे कश्ती पे रहो चाहे किनारे जाओ

    तुम ही सोचो भला ये शौक़ कोई शौक़ हुआ
    आज ऊँचाई पे बैठो कल उतारे जाओ

    मौत से खेल के करते हो मोहब्बत 'आजिज़'
    मुझ को डर है कहीं बे-मौत न मारे जाओ
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    मत बुरा उस को कहो गरचे वो अच्छा भी नहीं
    वो न होता तो ग़ज़ल मैं कभी कहता भी नहीं

    जानता था कि सितमगर है मगर क्या कीजे
    दिल लगाने के लिए और कोई था भी नहीं

    जैसा बे-दर्द हो वो फिर भी ये जैसा महबूब
    ऐसा कोई न हुआ और कोई होगा भी नहीं

    वही होगा जो हुआ है जो हुआ करता है
    मैं ने इस प्यार का अंजाम तो सोचा भी नहीं

    हाए क्या दिल है कि लेने के लिए जाता है
    उस से पैमान-ए-वफ़ा जिस पे भरोसा भी नहीं

    बारहा गुफ़्तुगू होती रही लेकिन मिरा नाम
    उस ने पूछा भी नहीं मैं ने बताया भी नहीं

    तोहफ़ा ज़ख़्मों का मुझे भेज दिया करता है
    मुझ से नाराज़ है लेकिन मुझे भूला भी नहीं

    दोस्ती उस से निबह जाए बहुत मुश्किल है
    मेरा तो वा'दा है उस का तो इरादा भी नहीं

    मेरे अशआर वो सुन सुन के मज़े लेता रहा
    मैं उसी से हूँ मुख़ातिब वो ये समझा भी नहीं

    मेरे वो दोस्त मुझे दाद-ए-सुख़न क्या देंगे
    जिन के दिल का कोई हिस्सा ज़रा टूटा भी नहीं

    मुझ को बनना पड़ा शाइ'र कि मैं अदना ग़म-ए-दिल
    ज़ब्त भी कर न सका फूट के रोया भी नहीं

    शाइरी जैसी हो 'आजिज़' की भली हो कि बुरी
    आदमी अच्छा है लेकिन बहुत अच्छा भी नहीं
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    इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो
    रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो

    रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
    चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो

    दीवाना-ए-गुल क़ैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
    क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो

    मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट
    पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो

    हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
    तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो

    ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मिरे प्यारे
    ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो

    वो शोख़ सितमगर तो सितम ढाए चले है
    तुम हो कि 'कलीम' अपनी ग़ज़ल गाए चलो हो
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    मेरे ही लहू पर गुज़र-औक़ात करो हो
    मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो

    दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
    वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो

    हम ख़ाक-नशीं तुम सुख़न-आरा-ए-सर-ए-बाम
    पास आ के मिलो दूर से क्या बात करो हो

    हम को जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है
    हम और भुला दें तुम्हें क्या बात करो हो

    यूँ तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
    जब वक़्त पड़े है तो मुदारात करो हो

    दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
    तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो

    बकने भी दो 'आजिज़' को जो बोले है बके है
    दीवाना है दीवाने से क्या बात करो हो
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    ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
    मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी
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    दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
    ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
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