Kaleem Aajiz

Kaleem Aajiz

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Kaleem Aajiz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kaleem Aajiz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे — Kaleem Aajiz
वो कहते हैं हर चोट पर मुस्कुराओ वफ़ा याद रक्खो सितम भूल जाओ — Kaleem Aajiz
सुना है हमें बे-वफ़ा तुम कहो हो ज़रा हम से आँखें मिला लो तो जानें — Kaleem Aajiz
ग़म है तो कोई लुत्फ़ नहीं बिस्तर-ए-गुल पर जी ख़ुश है तो काँटों पे भी आराम बहुत है — Kaleem Aajiz
दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है — Kaleem Aajiz
न जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ मिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे — Kaleem Aajiz
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़ तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो — Kaleem Aajiz
तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं — Kaleem Aajiz
ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी — Kaleem Aajiz

Ghazal

ग़म-ए-दिल ही ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाना बनता है यही ग़म शे'र बनता है यही अफ़्साना बनता है इसी से गर्मी-ए-दार-ओ-रसन है इंक़िलाबों में बहारों में यही ज़ुल्फ़-ओ-क़द-ए-जानाना बनता है सरों के ख़ुम सुराही गर्दनों की जाम ज़ख़्मों के मुहय्या जब ये हो लेते हैं तब मय-ख़ाना बनता है बिगड़ता क्या है परवाने का जल कर ख़ाक होने में कि फिर परवाने ही की ख़ाक से परवाना बनता है निगाह-ए-कम से मेरी चाक-दामानी को मत देखो हज़ारों होशयारों में कोई दीवाना बनता है ख़रीदा जा नहीं सकता है साक़ी ज़र्फ़ रिंदों का बहुत शीशे पिघलते हैं तो इक पैमाना बनता है मिरे ही दोनों हाथ आते हैं काम उन के सँवरने में दिखाता है कोई आईना कोई शाना बनता है बड़ा सरमाया है सब कुछ लुटा देना मोहब्बत में फ़क़ीराना लिबास आते हैं दिल शाहाना बनता है — Kaleem Aajiz
नज़र को आइना दिल को तिरा शाना बना देंगे तुझे हम क्या से क्या ऐ ज़ुल्फ़-ए-जानाना बना देंगे हमीं अच्छा है बन जाएँ सरापा सरगुज़िश्त अपनी नहीं तो लोग जो चाहेंगे अफ़्साना बना देंगे उमीद ऐसी न थी महफ़िल के अर्बाब-ए-बसीरत से गुनाह-ए-शम्अ को भी जुर्म-ए-परवाना बना देंगे हमें तो फ़िक्र दिल-साज़ी की है दिल है तो दुनिया है सनम पहले बना दें फिर सनम-ख़ाना बना देंगे न इतना छेड़ कर ऐ वक़्त दीवाना बना हम को हुए दीवाने हम तो सब को दीवाना बना देंगे न जाने कितने दिल बन जाएँगे इक दिल के टुकड़े से वो तोड़ें आइना हम आइना-ख़ाना बना देंगे — Kaleem Aajiz
ज़िंदगी माइल-ए-फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ आज भी है कल भी था सीने पे इक संग-ए-गिराँ आज भी है दिल-ए-अफ़सुर्दा को पहलू में लिए बैठे हैं बज़्म में मजमा-ए-ख़स्ता-जिगराँ आज भी है तल्ख़ी-ए-कोह-कनी कल भी मिरा हिस्सा था जाम-ए-शीरीं ब-नसीब-ए-दीगराँ आज भी है ज़ख़्म-ए-दिल के नहीं आसार ब-ज़ाहिर लेकिन चारा-गर से गला-ए-दर्द-ए-निहाँ आज भी है आज भी गर्म है बाज़ार जफ़ा-कारों का कल भी आरास्ता थी उन की दुकाँ आज भी है गोशा-ए-अम्न नहीं आज भी बुलबुल को नसीब चश्म-ए-सय्याद बहर-सू निगराँ आज भी है आज भी ज़ख़्म-ए-रग-ए-गुल से टपकता है लहू ख़ूँ में डूबी हुई काँटों की ज़बाँ आज भी है ज़िंदगी चौंक के बेदार हुई है लेकिन चश्म-ओ-दिल पर असर-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ आज भी है इस तरफ़ जिंस-ए-वफ़ा की वही अर्ज़ानी है उस तरफ़ इक निगह-ए-लुत्फ़-ए-गिराँ आज भी है हैफ़ क्यूँँ क़िस्मत-ए-शाएर पे न आए 'आजिज़' कल भी कम-बख़्त रहा मर्सियाँ-ख़्वाँ आज भी है — Kaleem Aajiz
है इन्हीं दो नामों से हर एक अफ़्साने का नाम एक तेरा नाम है इक तेरे दीवाने का नाम तुझ से रौशन है चराग़-ए-महफ़िल-ए-दार-ओ-रसन मुझ से भी इस दौर में ज़िंदा है परवाने का नाम तेरी ज़ुल्फ़-ओ-चश्म-ओ-लब का नाम है मेरी ग़ज़ल तेरा अंदाज़-ए-सुख़न मेरे ग़ज़ल गाने का नाम चल उसी अंदाज़ से हाँ चल उसी अंदाज़ से शोख़ी-ए-बाद-ए-सबा है तेरे इठलाने का नाम मौज-ए-ख़ुशबू-ए-ग़ज़ल बे-रंगी-ए-रू-ए-ग़ज़ल इक तिरे आने का है नाम इक तिरे जाने का नाम ज़िंदा-ए-जावेद मेरी शाइ'री ने कर दिया नाम तेरे गेसुओं का और मिरे शाने का नाम फूल तोड़े कोई पत्थर हम को मारा जाए है तू ने इतना कर दिया बदनाम दीवाने का नाम हम हैं 'आजिज़' आबरू-ए-बज़्म-ए-यारान-ए-ग़ज़ल अब इसी आईने से है आइना-ख़ाने का नाम — Kaleem Aajiz
वक़्त के दर पर भी है बहुत कुछ वक़्त के दर से आगे भी शाम-ओ-सहर के साथ भी चलिए शाम-ओ-सहरस आगे भी अक़्ल-ओ-ख़िरद के हंगामों में शौक़ का दामन छूट न जाए शौक़ बशर को ले जाता है अक़्ल-ए-बशर से आगे भी दार-ओ-रसन की रेशा-दवानी गर्दन-ओ-सर तक रहती है अहल-ए-जुनूँ का पाँव रहा है गर्दन-ओ-सर से आगे भी मेरे घर को आग लगा कर हम-सायों को हँसने दो शो'ले बढ़ कर जा पहुँचेंगे मेरे घर से आगे भी इश्क़ ने राह-ए-वफ़ा समझाई समझाने के ब'अद कहा वक़्त पड़ा तो जाना होगा राह-गुज़र से आगे भी शाएर फ़िक्र-ओ-नज़र का मालिक दिल का सुल्ताँ घर का फ़क़ीर दुनिया का पामाल क़दम भी दुनिया भर से आगे भी आँखें जो कुछ देख रही हैं उस से धोका खाएँ क्या दिल तो 'आजिज़' देख रहा है हद्द-ए-नज़र से आगे भी — Kaleem Aajiz
क्या ग़म है अगर शिकवा-ए-ग़म आम है प्यारे तू दिल को दुखा तेरा यही काम है प्यारे तेरे ही तबस्सुम का सहर नाम है प्यारे तू खोल दे गेसू तो अभी शाम है प्यारे इस वक़्त तिरा जान-ए-जहाँ नाम है प्यारे जो काम तू कर दे वो बड़ा काम है प्यारे जब प्यार किया चैन से क्या काम है प्यारे इस में तो तड़पने ही में आराम है प्यारे छूटी है न छूटेगी कभी प्यार की आदत मैं ख़ूब समझता हूँ जो अंजाम है प्यारे ऐ काश मिरी बात समझ में तिरी आए मेरी जो ग़ज़ल है मिरा पैग़ाम है प्यारे मैं हूँ जहाँ सौ फ़िक्र में सौ रंज में सौ दर्द तू है जहाँ आराम ही आराम है प्यारे गो मैं ने कभी अपनी ज़बाँ पर नहीं लाया सब जान रहे हैं तिरा क्या नाम है प्यारे हम दिल को लगा कर भी खटकते हैं दिलों में तू दिल को दिखा कर भी दिल-आराम है प्यारे कहता हूँ ग़ज़ल और रहा करता हूँ सरशार मेरा यही शीशा है यही जाम है प्यारे — Kaleem Aajiz
मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ ये जो आह-ओ-नाला-ओ-दर्द हैं किसी बे-वफ़ा की निशानियाँ यही मेरे दिन के रफ़ीक़ हैं यही मेरी रात की रानियाँ ये मिरी ज़बाँ पे ग़ज़ल नहीं मैं सुना रहा हूँ कहानियाँ कि किसी के अहद-ए-शबाब पर मिटीं कैसी कैसी जवानियाँ कभी आँसुओं को सुखा गईं मिरे सोज़-ए-दिल की हरारतें कभी दिल की नाव डुबो गईं मिरे आँसुओं की रवानियाँ अभी उस को इस की ख़बर कहाँ कि क़दम कहाँ है नज़र कहाँ अभी मस्लहत का गुज़र कहाँ कि नई नई हैं जवानियाँ ये बयान-ए-हाल ये गुफ़्तुगू है मिरा निचोड़ा हुआ लहू अभी सुन लो मुझ से कि फिर कभू न सुनोगे ऐसी कहानियाँ — Kaleem Aajiz
ये सितम की महफ़िल-ए-नाज़ है 'कलीम' इस को और सजाए जा वो दिखाएँ रक़्स-ए-सितमगरी तू ग़ज़ल का साज़ बजाए जा जो अकड़ के शान से जाए है प्यार से ये बताए जा कि बुलंदियों की है आरज़ू तू दिलों में पहले समाए जा वो जो ज़ख़्म दें सो क़ुबूल है तिरे वास्ते वही फूल है यही अहल-ए-दिल का उसूल है वो रुलाए जाएँ तू गाए जा तिरा सीधा सा वो बयान है तिरी टूटी-फूटी ज़बान है तिरे पास हैं यही ठेकरे तू महल इन्हीं से बनाए जा वो जफ़ा-शिआ'र ओ सितम-अदा तू सुख़न-तराज़ ओ ग़ज़ल-सरा वो तमाम काँटे उगाएँगे तू तमाम फूल खिलाए जा कोई लाख ज़ोहरा-जबीन है जिसे चाहें हम वो हसीन है 'कलीम' उस सरापा ग़ुरूर को ज़रा आइना तो दिखाए जा — Kaleem Aajiz
इम्तिहान-ए-शौक़ में साबित-क़दम होता नहीं इश्क़ जब तक वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-ग़म होता नहीं उन की ख़ातिर से कभी हम मुस्कुरा उट्ठे तो क्या मुस्कुरा लेने से दिल का दर्द कम होता नहीं जो सितम हम पर है उस की नौइयत कुछ और है वर्ना किस पर आज दुनिया में सितम होता नहीं तुम जहाँ हो बज़्म भी है शम्अ' भी परवाना भी हम जहाँ होते हैं ये सामाँ बहम होता नहीं रात भर होती हैं क्या क्या अंजुमन-आराइयाँ शम्अ' का कोई शरीक-ए-सुब्ह-ए-ग़म होता नहीं माँगता है हम से साक़ी क़तरे क़तरे का हिसाब ग़ैर से कोई हिसाब-ए-बेश-ओ-कम होता नहीं — Kaleem Aajiz
उन्हें फ़रियाद ना-ज़ेबा लगे है सितम करते बहुत अच्छा लगे है ख़ुदा उस बज़्म में हाफ़िज़ है दिल का यहाँ हर रोज़ इक चरका लगे है उन्हें अपने भी लगते हैं पराए पराया भी हमें अपना लगे है बग़ैर उस बे-वफ़ा से जी लगाए जो सच पूछो तो जी किस का लगे है मोहब्बत दिल-लगी जानो हो प्यारे वही जाने है दिल जिस का लगे है उठा आगे से साक़ी जाम-ओ-मीना दिल अच्छा हो तो सब अच्छा लगे है ज़रा देख आइना मेरी वफ़ा का कि तू कैसा था अब कैसा लगे है ग़ज़ल सुन कर मिरी कहने लगे वो मुझे ये शख़्स दीवाना लगे है ज़रूर आया करो जलसे में 'आजिज़' न आओ हो तो सन्नाटा लगे है — Kaleem Aajiz
हम को तो ख़ैर पहुँचना था जहाँ तक पहुँचे जो हमें रोक रहे थे वो कहाँ तक पहुँचे फ़स्ल-ए-गुल तक रहे या दौर-ए-ख़िज़ाँ तक पहुँचे बात जब निकली है मुँह से तो जहाँ तक पहुँचे मेरे अश'आर में है हुस्न-ए-मआनी की तलाश लोग अब तक न मिरे दर्द-ए-निहाँ तक पहुँचे मुझ को रहने दो मिरे दर्द की लज़्ज़त में ख़मोश ये वो अफ़्साना नहीं है जो ज़बाँ तक पहुँचे तेरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव किसे मिलती है किस की तक़दीर-ए-रसा है कि वहाँ तक पहुँचे मंज़िल-ए-दार-ओ-रसन भी है रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ के बा'द देखिए शौक़ हमें ले के कहाँ तक पहुँचे तर्जुमाँ अपना बनाया है मुझे रिंदों ने काश आवाज़ मिरी पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे आप के मशग़ला-ए-शेर-ओ-सुख़न से 'आजिज़' काम तो कुछ न हुआ नाम जहाँ तक पहुँचे — Kaleem Aajiz

Nazm

गए लेटने रात ढलते हुए उठे सुब्ह को आँख मलते हुए नहा धो के कपड़े बदलते हुए उठाई किताब और चलते हुए सवेरे का जब तक कि स्कूल है यही अपना हर रोज़ मा'मूल है खड़े हैं सड़क पर कि अब आई बस गुज़रता है इक इक मिनट इक बरस बस आई तो रश इस क़दर पेश-ओ-पस कि अल्लाह बस और बाक़ी हवस बढ़े हम भी चढ़ने को जब सब के साथ तो हैंडल पे था पाँव पैडल पे हाथ पैसेंजर की वो भीड़ वो बस का गेट गुज़रते हैं मच्छर जहाँ पर समेट कोई हो गया चोट खा कर फ़्लैट किसी की है कुहनी किसी का है पेट खड़े हों कहाँ पाँव रक्खें किधर अँधेरा इधर है अँधेरा उधर मगर हुक्म चैकर का है आइए खड़े क्यूँ हैं आगे बढ़े जाइए जहाँ में जहाँ तक जगह पाइए खिसकते खिसकते चले जाइए सितारों से आगे जहाँ और हैं ज़मीं और हैं आसमाँ और हैं — Kaleem Aajiz