यूँ इलाज-ए-दिल बीमार किया जाएगा
    शर्बत-ए-दीद से सरशार किया जाएगा

    हसरत-ए-दीद में बीनाई गँवा बैठे जो
    इस से कैसे तिरा दीदार किया जाएगा

    सो रहा हूँ मैं ज़माने से तिरा ख़्वाब लिए
    नींद से कब मुझे बेदार किया जाएगा

    टूट जाएगा भरम परियों की शहज़ादी का
    जब तिरे हुस्न को शहकार किया जाएगा

    ख़ुद-कुशी की ख़बर अख़बार की सुर्ख़ी होगी
    क़त्ल मुझ को पस-ए-दीवार किया जाएगा

    मैं सदाक़त हूँ मुझे मौत नहीं आएगी
    वैसे मस्लूब कई बार किया जाएगा

    इन चराग़ों के तबस्सुम में लहू है मेरा
    कब हवाओं को ख़बर-दार किया जाएगा

    दिल के जज़्बात जवाँ और भी हो जाएँगे
    मेरी राहों को जो दुश्वार किया जाएगा

    होंगे शर्मिंदा मनादिर के कलस भी 'अफ़ज़ल'
    किसी मस्जिद को जो मिस्मार किया जाएगा
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    Afzal Allahabadi
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    मिरी दीवानगी की हद न पूछो तुम कहाँ तक है
    ज़मीं पर हूँ मगर मेरी रसाई ला-मकाँ तक है

    तिरा जल्वा तो ऐसे आम है सारे ज़माने में
    वहीं तक देख सकता है नज़र जिस की जहाँ तक है

    किसी को क्या ख़बर एहसास है लेकिन मिरे दिल को
    कि उस के प्यार की बरसात मेरे दश्त-ए-जाँ तक है

    ज़रा बर्क़-ए-सितम से पूछ लेता काश कोई ये
    तिरे क़हर-ओ-ग़ज़ब का सिलसिला आख़िर कहाँ तक है

    हमीं चुभते हैं क्यूँ काँटों की सूरत आँख में तेरी
    फ़सादी का निशाना क्यूँ हमारे ही मकाँ तक है

    तवज्जोह ख़ाक के ज़र्रों की जानिब क्यूँ करें 'अफ़ज़ल'
    नज़र अपनी मह-ओ-परवीन तक है कहकशाँ तक है
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    Afzal Allahabadi
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    बुलंदी से कभी वो आश्नाई कर नहीं सकता
    जो तेरे आस्ताने की गदाई कर नहीं सकता

    ज़बाँ रखते हुए भी लब-कुशाई कर नहीं सकता
    कोई क़तरा समुंदर से लड़ाई कर नहीं सकता

    तू जुगनू है फ़क़त रातों के दामन में बसेरा कर
    मैं सूरज हूँ तू मुझ से आश्नाई कर नहीं सकता

    ख़ुदी की दौलत-ए-उज़मा ख़ुदा ने मुझ को बख़्शी है
    क़लंदर हूँ मैं शाहों की गदाई कर नहीं सकता

    सिफ़त फ़िरऔन की तुझ में है मैं मूसा का हामी हूँ
    कभी तस्लीम मैं तेरी ख़ुदाई कर नहीं सकता

    जो ज़िंदाँ में अज़िय्यत पर अज़िय्यत मुझ को देता है
    मैं उस ज़ालिम से उम्मीद-ए-रिहाई कर नहीं सकता

    जो कमतर है बड़ाई अपनी अपने मुँह से करता है
    मगर 'अफ़ज़ल' कभी अपनी बड़ाई कर नहीं सकता
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    Afzal Allahabadi
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    जो मिरी आरज़ू नहीं करता
    उस की मैं जुस्तुजू नहीं करता

    हिज्र-ए-जानाँ में अपने अश्कों से
    कौन है जो वुज़ू नहीं करता

    वो तो तेरा कलीम था वर्ना
    सब से तू गुफ़्तुगू नहीं करता

    सय्यद-उल-अम्बिया थे वो वर्ना
    सब को तू रू-ब-रू नहीं करता

    तेरी निस्बत मिली मुझे जब से
    मैं कोई आरज़ू नहीं करता

    हर घड़ी जिस की बात करता हूँ
    मुझ से वो गुफ़्तुगू नहीं करता

    दर-ब-दर यूँ नहीं भटकता मैं
    जो फ़रामोश तू नहीं करता

    हो नहीं पाती शाइरी 'अफ़ज़ल'
    नज़्र जब तक लहू नहीं करता
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    Afzal Allahabadi
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    ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो
    नशा है जिस में सुख़न का वही शराब है वो

    उसे न देख महकता हुआ गुलाब है वो
    न जाने कितनी निगाहों का इंतिख़ाब है वो

    मिसाल मिल न सकी काएनात में उस की
    जवाब उस का नहीं कोई ला-जवाब है वो

    मिरी इन आँखों को ताबीर मिल नहीं पाती
    जिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा ख़्वाब है वो

    न जाने कितने हिजाबों में वो छुपा है मगर
    निगाह-ए-दिल से जो देखूँ तो बे-हिजाब है वो

    उजाले अपने लुटा कर वो डूब जाएगा
    हसीन सुब्ह का रख़्शंदा आफ़्ताब है वो

    वो मुझ से पूछने आया है मेरा हाल 'अफ़ज़ल'
    जिसे बता न सकूँ दिल में इज़्तिराब है वो
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    Afzal Allahabadi
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    किसी की याद रुलाये तो क्या किया जाए
    शब-ए-फ़िराक़ सताए तो क्या किया जाए

    जो रफ़्ता रफ़्ता ग़म-ए-इंतिज़ार की दीमक
    मिरे वजूद को खाए तो क्या किया जाए

    शब-ए-फ़िराक़ हो या हो विसाल का मौसम
    ये दिल सुकून न पाए तो क्या किया जाए

    दिखा के चाँद सा चेहरा वो हुस्न का पैकर
    असीर अपना बनाए तो क्या किया जाए

    शराब-नोशी से मैं दूर भागता हूँ मगर
    कोई नज़र से भुलाए तो क्या किया जाए

    मिरे इलाज को कितने तबीब आए मगर
    दवा भी दर्द बढ़ाए तो क्या किया जाए

    सुकून मिलता है जिस की निगाह से 'अफ़ज़ल'
    वही निगाह चुराए तो क्या किया जाए
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    Afzal Allahabadi
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    कर दिया ख़ुद को समुंदर के हवाले हम ने
    तब कहीं गौहर-ए-नायाब निकाले हम ने

    ज़िंदगी नाम है चलने का तो चलते ही रहे
    रुक के देखे न कभी पाँव के छाले हम ने

    जब से हम हो गए दरवेश तिरे कूचे के
    तब से तोड़े नहीं सोने के निवाले हम ने

    तेरी चाहत सी नहीं देखी किसी की चाहत
    वैसे देखे हैं बहुत चाहने वाले हम ने

    हम-सफ़र तू जो रहा हम भी उजाले में रहे
    फिर तिरे बा'द कहाँ देखे उजाले हम ने

    एक भी शे'र गुहर बन के न चमका 'अफ़ज़ल'
    कितने दरिया-ए-ख़यालात खंगाले हम ने
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    Afzal Allahabadi
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    दवा-ए-दर्द-ए-ग़म-ओ-इज़्तिराब क्या देता
    वो मेरी आँखों को रंगीन ख़्वाब क्या देता

    थी मेरी आँखों की क़िस्मत में तिश्नगी लिक्खी
    वो अपनी दीद की मुझ को शराब क्या देता

    किया सवाल जो मैं ने वफ़ा के क़ातिल से
    ज़बाँ पे क़ुफ़्ल लगा था जवाब क्या देता

    मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ
    वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता

    वो जिस ने देखा नहीं इश्क़ का कभी मकतब
    मैं उस के हाथ में दिल की किताब क्या देता

    मिरे नसीब में मिट्टी का इक दिया भी न था
    तिरी हथेली पे मैं आफ़्ताब क्या देता

    मैं उस से प्यास का शिकवा न कर सका 'अफ़ज़ल'
    जो ख़ुद ही तिश्ना था वो मुझ को आब क्या देता
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    Afzal Allahabadi
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    अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है
    मुझ को दुश्मन से नहीं यार से डर लगता है

    कैसे दुश्मन के मुक़ाबिल वो ठहर पाएगा
    जिस को टूटी हुई तलवार से डर लगता है

    वो जो पाज़ेब की झंकार का शैदाई हो
    उस को तलवार की झंकार से डर लगता है

    मुझ को बालों की सफ़ेदी ने ख़बर-दार किया
    ज़िंदगी अब तिरी रफ़्तार से डर लगता है

    कर दें मस्लूब उन्हें लाख ज़माने वाले
    हक़-परस्तों को कहाँ दार से डर लगता है

    वो किसी तरह भी तैराक नहीं हो सकता
    दूर से ही जिसे मंजधार से डर लगता है

    मेरे आँगन में है वहशत का बसेरा 'अफ़ज़ल'
    मुझ को घर के दर-ओ-दीवार से डर लगता है
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    Afzal Allahabadi
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    मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ
    वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता
    Afzal Allahabadi
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