तड़प रहा था मैं जिस दर्द-ए-ला-दवा के लिए
वो मिल गया है मगर छीन ले ख़ुदा के लिए
वो मिल गया है मगर छीन ले ख़ुदा के लिए
मैं बूँद बूँद टपकता हूँ अपने होंटों पर
चला था ले के ये सरमाया कर्बला के लिए
फ़िशार-ए-ग़म ने मुझे चूर चूर कर डाला
किवाड़ खोल दे सारे ज़रा हवा के लिए
कटी हुई है मिरे ताज़ा मौसमों की ज़बाँ
कहाँ से लाऊँगा अल्फ़ाज़ अब दुआ के लिए
मिरी तलब ने मिरे हाथ तोड़ डाले हैं
बहुत कड़ा है ये लम्हा मिरी अना के लिए
कभी दरीचे समुंदर की सम्त खुलते थे
तरस गया हूँ मगर अब खुली फ़ज़ा के लिए
मुझे ख़बर है झुकेगी तिरी नज़र न कभी
बनी है ये तो सिफ़त चश्म-ए-बा-हया के लिए
हर एक चीज़ यहाँ काग़ज़ी लिबास में है
कोई जगह नहीं मिलती गुल-ए-वफ़ा के लिए
ख़याल में कई काँटे उतर गए 'अफ़ज़ल'
सज़ा मिली है ये इक हर्फ़-ए-ना-रसा के लिए
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वो जो बरसात में भीगा तो निगाहें उट्ठीं
यूँ लगा है कोई तुरशा हुआ पत्थर देखा
कोई साया भी न सह
में हुए घर से निकला
हम ने टूटी हुई दहलीज़ को अक्सर देखा
सोच का पेड़ जवाँ हो के बना ऐसा रफ़ीक़
ज़ेहन के क़द ने उसे अपने बराबर देखा
जब भी चाहा है कि मलबूस-ए-वफ़ा को छू लें
मिस्ल-ए-ख़ुशबू कोई उड़ता हुआ पैकर देखा
रक़्स करते हुए लम्हों की ज़बाँ गुंग हुई
अपने सीने में जो उतरा हुआ ख़ंजर देखा
ज़िंदगी इतनी परेशाँ है ये सोचा भी न था
उस के अतराफ़ में शोलों का समुंदर देखा
रात भर ख़ौफ़ से चटख़े थे सहर की ख़ातिर
सुब्ह-दम ख़ुद को बिखरते हुए दर पर देखा
वो जो उड़ती है सदा दस्त-ए-वफ़ा में 'अफ़ज़ल'
उसी मिट्टी में निहाँ दर्द का गौहर देखा
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मुझे बतलाईए अब कौन सी जीने की सूरत है
ज़माना इस घने जंगल में इक चीते की सूरत है
ज़माना इस घने जंगल में इक चीते की सूरत है
बिखरते जिस्म ले कर तुंद तूफ़ानों में बैठे हैं
कोई ज़र्रे की सूरत है कोई टीले की सूरत है
चुरा लाया था आँखों में जो इक तस्वीर दुनिया की
वो अब सहरा में इक सह
में हुए बच्चे की सूरत है
मिरी तहरीर के हर लफ़्ज़ में ज़िंदा हैं आवाज़ें
मगर हैरान हूँ चेहरा मिरा कत्बे की सूरत है
ये कैसी आग है 'अफ़ज़ल' जले साए भी पेड़ों के
धुएँ में किस तरफ़ जाऊँ अजब रस्ते की सूरत है
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हर चंद ज़िंदगी का सफ़र मुश्किलों में है
इंसाँ का अक्स फिर भी कई आइनों में है
इंसाँ का अक्स फिर भी कई आइनों में है
तहज़ीब को तलाश न कर शहर शहर में
तहज़ीब खंडरों में है कुछ पत्थरों में है
तुझ को सुकूँ नहीं है तो मिट्टी में डूब जा
आबाद इक जहान ज़मीं की तहों में है
कैसा तज़ाद है कि फ़ज़ा है धुआँ धुआँ
और आग है कि ज़ेर-ए-ज़मीं ख़ंदक़ों में है
इंसान बे-हिसी से है पत्थर बना हुआ
मुँह में ज़बान भी है लहू भी रगों में है
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उस पेड़ को छुआ तो समर-दार हो गया
फिर जाने क्या हुआ वो शरर-बार हो गया
फिर जाने क्या हुआ वो शरर-बार हो गया
मौसम की भूल थी कि मिरी दस्तरस की बात
पत्थर से एक फूल नुमूदार हो गया
बिखरे हुए हैं दिल में मिरी ख़्वाहिशों के रंग
अब मैं भी इक सजा हुआ बाज़ार हो गया
इक बार मैं भी ख़्वाब में बैठा था तख़्त पर
आँखें खुलीं तो और भी नादार हो गया
पहले तो सर को फोड़ लिया उस को देख कर
फिर मैं भी एक रौज़न-ए-दीवार हो गया
वैसे तमाम उम्र मिरी नींद में कटी
घर में नक़ब लगी तो मैं बेदार हो गया
यारो ये ज़िंदगी का मकाँ भी अजीब है
ता'मीर हो गया कभी मिस्मार हो गया
लफ़्ज़ों के फूल आँच सी देने लगे मुझे
बेबाक आज शो'ला-ए-गुफ़्तार हो गया
दुश्मन नज़र पड़ा तो मिटीं रंजिशें तमाम
लड़ने को सारा शहर ही तय्यार हो गया
मुजरिम बरी हुआ तो कई क़त्ल हो गए
बस्ती का इक ग़रीब गिरफ़्तार हो गया
'अफ़ज़ल' कुछ इस तरह की अचानक हवा चली
साँसें बहाल रखना भी दुश्वार हो गया
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गुम-सुम हवा के पेड़ से लिपटा हुआ हूँ में
कत्बे पे अपने हाथ से लिक्खा हुआ हूँ मैं
कत्बे पे अपने हाथ से लिक्खा हुआ हूँ मैं
आँखों में वसवसों की नई नींद बस गई
सो जाऊँ एक उम्र से जागा हुआ हूँ मैं
यारब रगों में ख़ून की हिद्दत नहीं रही
या कर्ब की सलीब पे लटका हुआ हूँ मैं
अपनी बुलंदियों से गिरूँ भी तो किस तरह
फैली हुई फ़ज़ाओं में बिखरा हुआ हूँ मैं
पत्ते गिरे तो और भी आसेब बन गए
वो शोर है कि ख़ुद से भी सहमा हुआ हूँ मैं
शाख़ों से टूटने की सदा दूर तक गई
महसूस हो रहा है कि टूटा हुआ हूँ मैं
वो आग है कि सारी जड़ें जल के रह गईं
वो ज़हर है कि फूल से काँटा हुआ हूँ मैं
कटते हुए तने का भी नोचा गया लिबास
गिर कर ज़मीं पे और भी रुस्वा हुआ हूँ मैं
'अफ़ज़ल' मैं सोचता हूँ ये क्या हो गया मुझे
मिट्टी मिली तो और भी चटख़ा हुआ हूँ मैं
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दामन दरीदा क़ल्ब-ओ-नज़र ज़ख़्म ज़ख़्म हैं
अब शहर-ए-आरज़ू में यही बूद-ओ-बाश है
बस अब तो रह गई है दिखावे की ज़िंदगी
साँसों के तार तार में एक इर्तिआ'श है
मिट्टी ने पी लिया है हरारत भरा लहू
जोश-ए-नुमू मिला तो बदन क़ाश क़ाश है
काँटों ने भी ख़िज़ाँ की ग़ुलामी क़ुबूल की
देखो तो आज चेहरा-ए-गुल पुर-ख़राश है
वो दौर अब कहाँ कि तुम्हारी हो जुस्तुजू
इस दौर में तो हम को ख़ुद अपनी तलाश है
'अफ़ज़ल' वो बन सँवर के तो आ जाएँगे कभी
आईना-ए-हयात मगर पाश पाश है
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मैं अपने दिल में नई ख़्वाहिशें सजाए हुए
खड़ा हुआ हूँ हवा में क़दम जमाए हुए
खड़ा हुआ हूँ हवा में क़दम जमाए हुए
नए जहाँ की तमन्ना में घर से निकला हूँ
हथेलियों पे नई मिशअलें जलाए हुए
हवा के फूल महकने लगे मुझे पा कर
मैं पहली बार हँसा ज़ख़्म को छुपाए हुए
न आँधियाँ हैं न तूफ़ाँ न ख़ून के सैलाब
हैं ख़ुशबुओं में मनाज़िर सभी नहाए हुए
पिघल गई हैं अचानक ग़मों की ज़ंजीरें
गिरे हैं धूप के नेज़े बदन चुराए हुए
दिखा रही है नई ज़िंदगी के नक़्श-ए-क़दम
सुकूँ की नींद गले से मुझे लगाए हुए
चटख़ने वाली ज़मीं दूर रह गई 'अफ़ज़ल'
हैं सारे खेत सितारों के लहलहाए हुए
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काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी
और भरे बाज़ार में तुझ को हया भी आएगी
और भरे बाज़ार में तुझ को हया भी आएगी
इत्र में कपड़े बसा कर मुतमइन है किस लिए
बा-वफ़ा हूँ जा कि यूँ बू-ए-वफ़ा भी आएगी
देख ले साहिल से जी भर के मचलती लहर को
इस तरफ़ कुछ देर में मौज-ए-फ़ना भी आएगी
दूधिया नाज़ुक गले में बाँध ले ता'वीज़ को
आज सुनता हूँ कि बस्ती में बला भी आएगी
रात के पिछले पहर दस्तक का रख लेना ख़याल
पत्ते खड़केंगे ज़रा आवाज़-ए-पा भी आएगी
उजली उजली ख़्वाहिशों पर नींद की चादर न डाल
याद के रौज़न से कुछ ताज़ा हवा भी आएगी
जा चुके सारे बगूले फ़िक्र की क्या बात है
खेत को सैराब करने अब घटा भी आएगी
दौर के लोगों को नज़रों में बसा कर देख ले
क़ुर्ब मिल जाएगा आँखों में जिला भी आएगी
शहर-ए-ना-पुरसाँ के मंज़र नक़्श कर ले ज़ेहन में
आँख रस्ते में कोई मंज़र गिरा भी आएगी
दिल की मस्जिद में कभी पढ़ ले तहज्जुद की नमाज़
फिर सहर के वक़्त होंटों पर दुआ भी आएगी
ज़िंदगी का ये मरज़ 'अफ़ज़ल' चला ही जाएगा
तेरे हाथों में कभी ख़ाक-ए-शिफ़ा भी आएगी
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मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया
मैं ने जिस चेहरे को देखा तेरे जैसा हो गया
मैं ने जिस चेहरे को देखा तेरे जैसा हो गया
चाँद में कैसे नज़र आए तिरी सूरत मुझे
आँधियों से आसमाँ का रंग मैला हो गया
एक मैं ही रौशनी के ख़्वाब को तरसा नहीं
आज तो सूरज भी जब निकला तो अंधा हो गया
ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो
जिस को साथी मिल गया वो और तन्हा हो गया
एक पत्थर ज़िंदगी ने ताक कर मारा मुझे
चोट वो खाई कि सारा जिस्म दोहरा हो गया
मिल गया मिट्टी में जब 'अफ़ज़ल' तो ये आई सदा
गिर गई दीवार और साया अकेला हो गया
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