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लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
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इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है
जिस को देखो वही है चुप चुप सा
जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है
खो चुके हम यक़ीन जैसी शय
तू अभी तक किसी गुमान में है
ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन
आईना भी इसी चटान में है
सर-बुलंदी नसीब हो कैसे
सर-निगूँ है कि साएबान में है
ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते
कोई आसेब इस मकान में है
आसरा दिल को इक उमीद का है
ये हवा कब से बादबान में है
ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने
कौन है जो हमारे ध्यान में है
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आज की रात भी गुज़री है मिरी कल की तरह
हाथ आए न सितारे तिरे आँचल की तरह
हाथ आए न सितारे तिरे आँचल की तरह
हादसा कोई तो गुज़रा है यक़ीनन यारो
एक सन्नाटा है मुझ में किसी मक़्तल की तरह
फिर न निकला कोई घर से कि हवा फिरती थी
संग हाथों में उठाए किसी पागल की तरह
तू कि दरिया है मगर मेरी तरह प्यासा है
मैं तेरे पास चला आऊँगा बादल की तरह
रात जलती हुई इक ऐसी चिता है जिस पर
तेरी यादें हैं सुलगते हुए संदल की तरह
मैं हूँ इक ख़्वाब मगर जागती आँखों का 'अमीर'
आज भी लोग गँवा दें न मुझे कल की तरह
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Ameer Qazalbash
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