mere junoon ka nateeja zaroor niklega | मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा

  - Ameer Qazalbash

मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा

  - Ameer Qazalbash

Samundar Shayari

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    इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
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    नज़र आने से पहले डर रहा हूँ
    कि हर मंज़र का पस-मंज़र रहा हूँ

    मुझे होना पड़ेगा रेज़ा रेज़ा
    मैं सर से पाँव तक पत्थर रहा हूँ

    किसी को क्यूँ मैं ये एज़ाज़ बख़़शुंगा
    मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ

    मुझी को सुर्ख़-रू होने का हक़ है
    कि मैं अपने लहू में तर रहा हूँ

    मिरे घर में तो कोई भी नहीं है
    ख़ुदा जाने मैं किस से डर रहा हूँ

    मैं क्या जानूँ घरों का हाल क्या है
    मैं सारी ज़िंदगी बाहर रहा हूँ

    तअल्लुक़ है इसी बस्ती से मेरा
    हमेशा से मगर बच कर रहा हूँ
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    Ameer Qazalbash
    जंग जारी है ख़ानदानों में
    ग़ैर महफ़ूज़ हूँ मकानों में

    लफ़्ज़ पथरा गए हैं होंटों पर
    लोग क्या कह गए हैं कानों में

    रात घर में थी सर-फिरी आँधी
    सिर्फ़ काँटे हैं फूलदानों में

    माबदों की ख़बर नहीं मुझ को
    ख़ैरियत है शराब-ख़ानों में

    अब सिपर ढूँड कोई अपने लिए
    तीर कम रह गए कमानों में

    नाख़ुदा क्या ख़ुदा रखे महफ़ूज़
    वो हवाएँ हैं बादबानों में

    दाल चुनने में हाथ आएँगे
    जितने कंकर हैं कार-ख़ानों में

    ढूँडता फिर रहा हूँ ख़ाली हाथ
    जाने क्या चीज़ उन दुकानों में
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    Ameer Qazalbash
    मिरे हाल पर मेहरबानी करे
    ख़ुदा से कहो हुक्म-ए-सानी करे

    मैं इक बूँद पानी बड़ी चीज़ हूँ
    समुंदर मिरी पासबानी करे

    पढ़ें लोग तहरीर-ए-दीवार ओ दर
    ख़ुलासा मिरी बे-ज़बानी करे

    अज़ल से मैं उस के तआक़ुब में हूँ
    जो लम्हा मुझे ग़ैर-फ़ानी करे

    वो बख़्शे उजाले किसी सुब्ह को
    कोई शाम रौशन सुहानी करे

    मिरे साए में सब हैं मेरे सिवा
    कोई तो मिरी साएबानी करे

    कोई है जो बढ़ के उठा ले 'अमीर'
    वो तेशा जो पत्थर को पानी करे
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    Ameer Qazalbash
    वो इक लफ़्ज़ जो बे-सदा जाएगा
    वही मुद्दतों तक सुना जाएगा

    कोई है जो मेरे तआक़ुब में है
    मुझे मेरा चेहरा दिखा जाएगा

    वो इक शख़्स जो दुश्मन-ए-जाँ सही
    मगर फिर भी अपना कहा जाएगा

    जलेगी कोई मिशअल-ए-जाँ अभी
    मगर फिर अंधेरा सा छा जाएगा

    नफ़ी-ए-जुरअत-ए-हक़-नुमाई सही
    मगर कब किसी से कहा जाएगा

    यहाँ इक शजर मुंतज़िर सा भी है
    अब आख़िर कहाँ तक चला जाएगा

    मैं वो मिशअल-ए-नीम-शब हूँ 'अमीर'
    जिसे कल का सूरज बुझा जाएगा
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    Ameer Qazalbash
    बनते हैं फ़रज़ाने लोग
    कितने हैं दीवाने लोग

    दैर ओ हरम की राह से ही
    जाते हैं मय-ख़ाने लोग

    देख के मुझ को गुम-सुम हैं
    आए थे समझाने लोग

    क्या सुनते नासेह की बात
    हम ठहरे दीवाने लोग

    नीची नज़र से मुझ को न देखो
    घड़ लेंगे अफ़्साने लोग

    दीवाना कहते हैं 'अमीर'
    ख़ूब मुझे पहचाने लोग
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    Ameer Qazalbash

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