Afzal Allahabadi

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Afzal Allahabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Afzal Allahabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँँ वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता — Afzal Allahabadi

Ghazal

यूँँ इलाज-ए-दिल बीमार किया जाएगा शर्बत-ए-दीद से सरशार किया जाएगा हसरत-ए-दीद में बीनाई गँवा बैठे जो इस से कैसे तिरा दीदार किया जाएगा सो रहा हूँ मैं ज़माने से तिरा ख़्वाब लिए नींद से कब मुझे बेदार किया जाएगा टूट जाएगा भरम परियों की शहज़ादी का जब तिरे हुस्न को शहकार किया जाएगा ख़ुद-कुशी की ख़बर अख़बार की सुर्ख़ी होगी क़त्ल मुझ को पस-ए-दीवार किया जाएगा मैं सदाक़त हूँ मुझे मौत नहीं आएगी वैसे मस्लूब कई बार किया जाएगा इन चराग़ों के तबस्सुम में लहू है मेरा कब हवाओं को ख़बर-दार किया जाएगा दिल के जज़्बात जवाँ और भी हो जाएँगे मेरी राहों को जो दुश्वार किया जाएगा होंगे शर्मिंदा मनादिर के कलस भी 'अफ़ज़ल' किसी मस्जिद को जो मिस्मार किया जाएगा — Afzal Allahabadi
ये हक़ीक़त है वो कमज़ोर हुआ करती हैं अपनी तक़दीर का क़ौ में जो गिला करती हैं रेत पर जब भी बनाता है घरौंदा कोई सर-फिरी मौजें उसे देख लिया करती हैं मैं गुलिस्ताँ की हिफ़ाज़त की दुआ करता हूँ बिजलियाँ मेरे नशेमन पे गिरा करती हैं जाने क्या वस्फ़ नज़र आता है मुझ में उन को तितलियाँ मेरे तआ'क़ुब में रहा करती हैं तेरी दहलीज़ से निस्बत जिसे हो जाती है अज़्मतें उस के मुक़द्दर में हुआ करती हैं क्यूँँ न गुल-बूटों के चेहरों पे निखार आ जाए ये हवाएँ जो तिरा ज़िक्र किया करती हैं अपनी नज़रों में जो रखता है तिरे नक़्श-ए-क़दम मंज़िलें उस के तआ'क़ुब में रहा करती हैं चैन की नींद मुझे आए तो कैसे आए मेरी आँखें जो तिरा ख़्वाब बुना करती हैं उस की रहमत के दिए जो भी हैं रौशन 'अफ़ज़ल' आँधियाँ उन की हिफ़ाज़त में रहा करती हैं — Afzal Allahabadi
यादों के नशेमन को जलाया तो नहीं है हम ने तुझे इस दिल से भुलाया तो नहीं है कौनैन की वुसअ'त भी सिमट जाती है जिस में ऐ दिल कहीं तुझ में वो समाया तो नहीं है हर शय से वो ज़ाहिर है ये एहसान है उस का ख़ुद को मिरी नज़रों से छुपाया तो नहीं है ज़ुल्फ़ों की स्याही में अजब हुस्न-ए-निहाँ है ये रात उसी हुस्न का साया तो नहीं है वाक़िफ़ हैं तिरे दर्द से ऐ नग़्मा-ए-उल्फ़त हम ने तुझे हर साज़ पे गाया तो नहीं है उस ने जो लिखा था कभी साहिल की जबीं पर उस नाम को मौजों ने मिटाया तो नहीं है वो शहर की इस भीड़ में आता नहीं 'अफ़ज़ल' फिर भी चलो देखें कहीं आया तो नहीं है — Afzal Allahabadi
ये बता दे मुझ को मेरे दिल किसे आवाज़ दूँ ख़ुद मसीहा है मिरा क़ातिल किसे आवाज़ दूँ जितने साक़ी थे मिरे सब नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गए और कोसों दूर है साहिल किसे आवाज़ दूँ ले गया वो साथ अपने गुलशन-ए-दिल की बहार सूनी सूनी है मिरी महफ़िल किसे आवाज़ दूँ हाल मेरा ख़ंजर-ए-माज़ी से ज़ख़्मी हो गया रो रहा है मेरा मुस्तक़बिल किसे आवाज़ दूँ वो चलाता है अजब अंदाज़ से तीर-ए-नज़र और में हो जाता हूँ बिस्मिल किसे आवाज़ दूँ कौन है मुश्किल-कुशा मेरा क़बा तेरे सिवा जब पड़े मुझ पर कोई मुश्किल किसे आवाज़ दूँ जाँ निछावर कर रहा था मुझ पे जो 'अफ़ज़ल' कभी दुश्मनों में वो भी है शामिल किसे आवाज़ दूँ — Afzal Allahabadi
मिरी दीवानगी की हद न पूछो तुम कहाँ तक है ज़मीं पर हूँ मगर मेरी रसाई ला-मकाँ तक है तिरा जल्वा तो ऐसे आम है सारे ज़माने में वहीं तक देख सकता है नज़र जिस की जहाँ तक है किसी को क्या ख़बर एहसास है लेकिन मिरे दिल को कि उस के प्यार की बरसात मेरे दश्त-ए-जाँ तक है ज़रा बर्क़-ए-सितम से पूछ लेता काश कोई ये तिरे क़हर-ओ-ग़ज़ब का सिलसिला आख़िर कहाँ तक है हमीं चुभते हैं क्यूँँ काँटों की सूरत आँख में तेरी फ़सादी का निशाना क्यूँँ हमारे ही मकाँ तक है तवज्जोह ख़ाक के ज़र्रों की जानिब क्यूँँ करें 'अफ़ज़ल' नज़र अपनी मह-ओ-परवीन तक है कहकशाँ तक है — Afzal Allahabadi
लुटा रहा हूँ मैं लाल-ओ-गुहर अँधेरे में तलाश करती है किस को नज़र अँधेरे में वो जिस की राह में मैं ने दिए जलाए थे गया वो शख़्स मुझे छोड़ कर अँधेरे में चराग़ कौन उठा ले गया मिरे घर से सिसक रहे हैं मिरे बाम-ओ-दर अँधेरे में था तीरगी के जनाज़े पे एक हश्र बपा जो उस के आने से फैली ख़बर अँधेरे में कोई हथेली पे फिरता है आफ़्ताब लिए भटक रहा है कोई दर-ब-दर अँधेरे में में कोह-ए-नूर हूँ नादाँ तुझे ख़बर भी नहीं मुझे छुपाने की कोशिश न कर अँधेरे में मुसाफिरों को वो राहें दिखाएगा 'अफ़ज़ल' चराग़ रख दो सर-ए-रहगुज़र अँधेरे में — Afzal Allahabadi
हर नग़मा-ए-पुर-दर्द हर इक साज़ से पहले हंगामा बपा होता है आग़ाज़ से पहले दिल दर्द-ए-मोहब्बत से तो वाक़िफ़ भी नहीं था जानाँ तिरे बख़्शे हुए एज़ाज़ से पहले शो'लों पे चलाती है मोहब्बत दिल-ए-नादाँ अंजाम ज़रा सोच ले आग़ाज़ से पहले अब मेरी तबाही का उसे ग़म भी नहीं है जिस ने मुझे चाहा था बड़े नाज़ से पहले शाहीन वो कहलाने का हक़दार नहीं है जो सू-ए-फ़लक देखे न परवाज़ से पहले अब राज़ की बातें न बता दे वो किसी से ये ख़ौफ़ नहीं था कभी हमराज़ से पहले थी मीर-तक़ी-'मीर'' की नौहागरी मशहूर 'अफ़ज़ल' की सिसकती हुई आवाज़ से पहले — Afzal Allahabadi
दवा-ए-दर्द-ए-ग़म-ओ-इज़्तिराब क्या देता वो मेरी आँखों को रंगीन ख़्वाब क्या देता थी मेरी आँखों की क़िस्मत में तिश्नगी लिक्खी वो अपनी दीद की मुझ को शराब क्या देता किया सवाल जो मैं ने वफ़ा के क़ातिल से ज़बाँ पे क़ुफ़्ल लगा था जवाब क्या देता मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँँ वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता वो जिस ने देखा नहीं इश्क़ का कभी मकतब मैं उस के हाथ में दिल की किताब क्या देता मिरे नसीब में मिट्टी का इक दिया भी न था तिरी हथेली पे मैं आफ़्ताब क्या देता मैं उस से प्यास का शिकवा न कर सका 'अफ़ज़ल' जो ख़ुद ही तिश्ना था वो मुझ को आब क्या देता — Afzal Allahabadi
अश्क आँखों में लिए आठों पहर देखेगा कौन हम नहीं होंगे तो तेरी रहगुज़र देखेगा कौन शम्अ' भी बुझ जाएगी परवाना भी जल जाएगा रात के दोनों मुसाफ़िर हैं शजर देखेगा कौन सोने और चाँदी के बर्तन की नुमाइश है यहाँ मैं हूँ कूज़ा-गर मिरा दस्त-ए-हुनर देखेगा कौन जिस क़दर डूबा हुआ हूँ ख़ुद मैं अपने ख़ून में ख़ुद को अपने ख़ून में यूँँ तर-ब-तर देखेगा कौन हर तरफ़ मक़्तल में है छाई हुई वीरानियाँ नेज़ा-ए-बातिल पे आख़िर मेरा सर देखेगा कौन मेरे ज़ाहिर पर निगाहें सब की हैं 'अफ़ज़ल' मगर मेरे अंदर जो छुपा है वो गुहर देखेगा कौन — Afzal Allahabadi
सुलगती रेत पे तहरीर जो कहानी है मिरे जुनूँ की इक अनमोल वो निशानी है मैं अपने आप को तन्हा समझ रहा था मगर सुना है तुम ने भी सहरा की ख़ाक छानी है ग़मों की धूप में रहना है साएबाँ की तरह ख़याल-ए-गेसू-ए-जानाँ की मेहरबानी है कभी उधर से जो गुज़रेगा कारवाँ अपना तो हम भी देखेंगे दरिया में कितना पानी है मैं अब भी शान से ज़िंदा हूँ शहर-ए-क़ातिल में मिरे ख़ुदा की यक़ीनन ये मेहरबानी है बुरा न मानो तो मैं साफ़ साफ़ ये कह दूँ तुम्हारे प्यार का दा'वा फ़क़त ज़बानी है अँधेरा रहता न बाक़ी कहीं मगर 'अफ़ज़ल' कब आँधियों ने चराग़ों की बात मानी है — Afzal Allahabadi
बुलंदी से कभी वो आशनाई कर नहीं सकता जो तेरे आस्ताने की गदाई कर नहीं सकता ज़बाँ रखते हुए भी लब-कुशाई कर नहीं सकता कोई क़तरा समुंदर से लड़ाई कर नहीं सकता तू जुगनू है फ़क़त रातों के दामन में बसेरा कर मैं सूरज हूँ तू मुझ से आशनाई कर नहीं सकता ख़ुदी की दौलत-ए-उज़मा ख़ुदा ने मुझ को बख़्शी है क़लंदर हूँ मैं शाहों की गदाई कर नहीं सकता सिफ़त फ़िरऔन की तुझ में है मैं मूसा का हामी हूँ कभी तस्लीम मैं तेरी ख़ुदाई कर नहीं सकता जो ज़िंदाँ में अज़िय्यत पर अज़िय्यत मुझ को देता है मैं उस ज़ालिम से उम्मीद-ए-रिहाई कर नहीं सकता जो कमतर है बड़ाई अपनी अपने मुँह से करता है मगर 'अफ़ज़ल' कभी अपनी बड़ाई कर नहीं सकता — Afzal Allahabadi
ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो नशा है जिस में सुख़न का वही शराब है वो उसे न देख महकता हुआ गुलाब है वो न जाने कितनी निगाहों का इंतिख़ाब है वो मिसाल मिल न सकी काएनात में उस की जवाब उस का नहीं कोई ला-जवाब है वो मिरी इन आँखों को ता'बीर मिल नहीं पाती जिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा ख़्वाब है वो न जाने कितने हिजाबों में वो छुपा है मगर निगाह-ए-दिल से जो देखूँ तो बे-हिजाब है वो उजाले अपने लुटा कर वो डूब जाएगा हसीन सुब्ह का रख़्शंदा आफ़्ताब है वो वो मुझ से पूछने आया है मेरा हाल 'अफ़ज़ल' जिसे बता न सकूँ दिल में इज़्तिराब है वो — Afzal Allahabadi
ग़मों की धूप में मिलते हैं साएबाँ बन कर ज़मीं पे रहते हैं कुछ लोग आसमाँ बन कर उड़े हैं जो तिरे क़दमों से ख़ाक के ज़र्रे चमक रहे हैं फ़लक पर वो कहकशाँ बन कर जिन्हें नसीब हुई है तिरे बदन की नसीम महक रहे हैं ज़मीं पर वो गुल्सिताँ बन कर में इज़्तिराब के आलम में रक़्स करता रहा कभी ग़ुबार की सूरत कभी धुआँ बन कर मिरी सदाओं को अब तो पनाह मिल जाए तुझे पुकार रहा हूँ तिरी ज़बाँ बन कर मैं इस ज़मीन की वुसअ'त पे सैर करता हूँ फ़लक के चाँद सितारों का राज़-दाँ बन कर मसर्रतों की फ़ज़ा में सदा वो रहते हैं जो ग़म के मारों से मिलते हैं मेहरबाँ बन कर उन्हीं को शान-ए-चमन ये ज़माना कहता है चमन को लूट रहे हैं जो बाग़बाँ बन कर मैं हर्फ़ हर्फ़ जिसे पढ़ चुका हूँ ऐ 'अफ़ज़ल' वरक़ वरक़ पे वो बिखरा है दास्ताँ बन कर — Afzal Allahabadi
अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है मुझ को दुश्मन से नहीं यार से डर लगता है कैसे दुश्मन के मुक़ाबिल वो ठहर पाएगा जिस को टूटी हुई तलवार से डर लगता है वो जो पाज़ेब की झंकार का शैदाई हो उस को तलवार की झंकार से डर लगता है मुझ को बालों की सफ़ेदी ने ख़बर-दार किया ज़िंदगी अब तिरी रफ़्तार से डर लगता है कर दें मस्लूब उन्हें लाख ज़माने वाले हक़-परस्तों को कहाँ दार से डर लगता है वो किसी तरह भी तैराक नहीं हो सकता दूर से ही जिसे मँझधार से डर लगता है मेरे आँगन में है वहशत का बसेरा 'अफ़ज़ल' मुझ को घर के दर-ओ-दीवार से डर लगता है — Afzal Allahabadi