ashk aankhoñ men li.e aathon pahar dekhega kaun | अश्क आँखों में लिए आठों पहर देखेगा कौन

  - Afzal Allahabadi

अश्क आँखों में लिए आठों पहर देखेगा कौन
हम नहीं होंगे तो तेरी रहगुज़र देखेगा कौन

शम्अ भी बुझ जाएगी परवाना भी जल जाएगा
रात के दोनों मुसाफ़िर हैं शजर देखेगा कौन

सोने और चाँदी के बर्तन की नुमाइश है यहाँ
मैं हूँ कूज़ा-गर मिरा दस्त-ए-हुनर देखेगा कौन

जिस क़दर डूबा हुआ हूँ ख़ुद मैं अपने ख़ून में
ख़ुद को अपने ख़ून में यूँँ तर-ब-तर देखेगा कौन

हर तरफ़ मक़्तल में है छाई हुई वीरानियाँ
नेज़ा-ए-बातिल पे आख़िर मेरा सर देखेगा कौन

मेरे ज़ाहिर पर निगाहें सब की हैं 'अफ़ज़ल' मगर
मेरे अंदर जो छुपा है वो गुहर देखेगा कौन

  - Afzal Allahabadi

Aansoo Shayari

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