Ajmal Siraj

Top 10 of Ajmal Siraj

    बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा
    मगर वो शाम किसी शाम भी नहीं आई
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    क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो
    अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो

    हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं
    वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो

    कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था
    याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो

    सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा
    फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो

    इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल'
    अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो
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    दुश्वार है इस अंजुमन-आरा को समझना
    तन्हा न कभी तुम दिल-ए-तन्हा को समझना

    हो जाए तो हो जाए इज़ाफ़ा ग़म-ए-दिल में
    क्या अक़्ल से सौदा-ए-तमन्ना को समझना

    इक लम्हा-ए-हैरत के सिवा कुछ भी नहीं है
    कुछ और न इस तुंदी-ए-दरिया को समझना

    कुछ तेज़ हवाओं ने भी दुश्वार किया है
    क़दमों के निशानात से सहरा को समझना
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    ज़मीं पर आसमाँ कब तक रहेगा
    ये हैरत का मकाँ कब तक रहेगा

    नज़र कब आश्ना-ए-रंग होगी
    तमाशा-ए-ख़िज़ाँ कब तक रहेगा

    रहेगी गर्मी-ए-अनफ़ास कब तक
    रगों में ख़ूँ रवाँ कब तक रहेगा

    हक़ीक़त कब असर-अंदाज़ होगी
    ख़सारे में जहाँ कब तक रहेगा

    बदल जाएँगे ये दिन रात 'अजमल'
    कोई ना-मेहरबाँ कब तक रहेगा
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    हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे
    हमारे साथ हों दो-चार भी जो हम जैसे

    किसे दिमाग़ जुनूँ की मिज़ाज-पुर्सी का
    सुनेगा कौन गुज़रती है शाम-ए-ग़म जैसे

    भला हुआ कि तिरा नक़्श-ए-पा नज़र आया
    ख़िरद को रास्ता समझे हुए थे हम जैसे

    मिरी मिसाल तो ऐसी है जैसे ख़्वाब कोई
    मिरा वजूद समझ लीजिए अदम जैसे

    अब आप ख़ुद ही बताएँ ये ज़िंदगी क्या है
    करम भी उस ने किए हैं मगर सितम जैसे
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    शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़
    और सितम ये है कि आ जाती है रोज़

    कोई दिन आसाँ नहीं जाता मिरा
    कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़

    मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी
    मेरे सर से ये बला जाती है रोज़

    जाने किस की सुर्ख़-रूई के लिए
    ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़

    गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम
    या समाअ'त चहचहा जाती है रोज़

    देखने वालों को 'अजमल' ज़िंदगी
    रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़
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    तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं
    ऐसा कभी हुआ है जो ऐसा करूँगा मैं

    गो ग़म अज़ीज़ है मुझे तेरे फ़िराक़ का
    फिर भी इस इम्तिहान का शिकवा करूँगा मैं

    आँखों को अश्क ओ ख़ूँ भी फ़राहम करूँगा मैं
    दिल के लिए भी दर्द मुहय्या करूँगा मैं

    राहत भी रंज, रंज भी राहत हो जब तो फिर
    क्या एतिबार-ए-ख़्वाहिश-ए-दुनिया करूँगा मैं

    रक्खा है क्या जहान में ये और बात है
    ये और बात है कि तक़ाज़ा करूँगा मैं

    ये रहगुज़र कि जा-ए-क़याम-ओ-क़रार थी
    या'नी अब उस गली से भी गुज़रा करूँगा मैं

    या'नी कुछ इस तरह कि तुझे भी ख़बर न हो
    इस एहतियात से तुझे देखा करूँगा मैं

    है देखने की चीज़ तो ये इल्तिफ़ात भी
    देखोगे तुम गुरेज़ भी ऐसा करूँगा मैं

    हैरान ओ दिल-शिकस्ता हूँ इस हाल-ए-ज़ार पर
    कब जानता था अपना तमाशा करूँगा मैं

    हाँ खींच लूँगा वक़्त की ज़ंजीर पाँव से
    अब के बहार आई तो ऐसा करूँगा मैं
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    दीवार याद आ गई दर याद आ गया
    दो गाम ही चले थे कि घर याद आ गया

    कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए
    दस्तार याद आ गई सर याद आ गया

    दुनिया की बे-रुख़ी का गिला कर रहे थे लोग
    हम को तिरा तपाक मगर याद आ गया

    फिर तीरगी-ए-राहगुज़र याद आ गई
    फिर वो चराग़-ए-राहगुज़र याद आ गया

    'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं
    क्या जाने क्या करेंगे अगर याद आ गया
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    बुझ गया रात वो सितारा भी
    हाल अच्छा नहीं हमारा भी

    ये जो हम खोए खोए रहते हैं
    इस में कुछ दख़्ल है तुम्हारा भी

    डूबना ज़ात के समुंदर में
    है ये तूफ़ान भी किनारा भी

    अब मुझे नींद ही नहीं आती
    ख़्वाब है ख़्वाब का सहारा भी

    लोग जीते हैं किस तरह 'अजमल'
    हम से होता नहीं गुज़ारा भी
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    Ajmal Siraj
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    मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है
    और तू है कि मिरी जान को आया हुआ है

    बस इसी बोझ से दोहरी हुई जाती है कमर
    ज़िंदगी का जो ये एहसान उठाया हुआ है

    क्या हुआ गर नहीं बादल ये बरसने वाला
    ये भी कुछ कम तो नहीं है जो ये आया हुआ है

    राह चलती हुई इस राह-गुज़र पर 'अजमल'
    हम समझते हैं क़दम हम ने जमाया हुआ है

    हम ये समझे थे कि हम भूल गए हैं उस को
    आज बे-तरह हमें याद जो आया हुआ है

    वो किसी रोज़ हवाओं की तरह आएगा
    राह में जिस की दिया हम ने जलाया हुआ है

    कौन बतलाए उसे अपना यक़ीं है कि नहीं
    वो जिसे हम ने ख़ुदा अपना बनाया हुआ है

    यूँही दीवाना बना फिरता है वर्ना 'अजमल'
    दिल में बैठा हुआ है ज़ेहन पे छाया हुआ है
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