मैं परेशान वो दुखी हुई है
ये मोहब्बत है तो बड़ी हुई है
ये मोहब्बत है तो बड़ी हुई है
कुछ भी अपना नहीं है मेरे पास
बद-दुआ भी किसी की दी हुई है
उस ने पूछी है आख़िरी ख़्वाहिश
और मोहब्बत भी मैं ने की हुई है
आज ग़ुस्सा नहीं पिऊॅंगा मैं
आज मैं ने शराब पी हुई है
मैं तुम्हें इतनी बार चाहता हूँ
जितनी औरत पे शा'इरी हुई है
बच्चा गिरवा के क्या मिलेगा तुम्हें
दुनिया पहले बहुत गिरी हुई है
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किस को रौशन बना रहे हो तुम
इतना जो बुझते जा रहे हो तुम
इतना जो बुझते जा रहे हो तुम
फूल किस ने क़बूल करने हैं
जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम
लोग पागल बनाए जा चुके हैं
अब नया क्या बना रहे हो तुम
गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं
शहर में गुल खिला रहे हो तुम
और किस ने तुम्हें नहीं देखा
और किस के ख़ुदा रहे हो तुम
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बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है
लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है
लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है
हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए
फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है
पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है
इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है
वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे
कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है
मैं पल में उस के जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर
मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है
शादाब गुज़रगाहों पे तेरे काँटो की तिज़ारत होती है
वीरान गुज़रगाहों पे मेरी आँखों को छलकना पड़ता है
ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है
हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है
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Muzdum Khan
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ठहराव तो उस
में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी
में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी
मैं कपड़े बदलते सोचता था, वो मर्द बदल लिया करती थी
मुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे
वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी
मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे
मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी
उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया
गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी
तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से
कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन से जल लिया करती थी
आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह
मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी
Read Fullमुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे
वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी
मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे
मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी
उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया
गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी
तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से
कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन से जल लिया करती थी
आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह
मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी
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मुझे अपनी ख़बर नहीं होती थी, एहसास नहीं होता था कोई
मगर इस का ये मतलब नहीं है मेरे पास नहीं होता था कोई
मगर इस का ये मतलब नहीं है मेरे पास नहीं होता था कोई
इक ऐसी चुड़ैल के ज़द में था मैं पिछली बरस की शामों में
जो ऐसी जगह से भी नोचती थी जहाँ मास नहीं होता था कोई
मुझे जड़ से उखाड़ने वालों की साँसों का उखड़ना रिवायत है
मैं पेड़ नहीं होता था कोई मैं घास नहीं होता था कोई
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