bistar ko jhatkna padta hai kapdo ko badalna padta hai | बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है

  - Muzdum Khan

बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है
लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है

हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए
फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है

पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है
इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है

वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे
कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है

मैं पल में उसके जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर
मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है

शादाब गुज़रगाहों पे तेरे काँटो की तिज़ारत होती है
वीरान गुज़रगाहों पे मेरी आँखों को छलकना पड़ता है

ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है
हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है

  - Muzdum Khan

Phool Shayari

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