na koi been bajai na tokri khuli | न कोई बीन बजाई न टोकरी खोली

  - Muzdum Khan

न कोई बीन बजाई न टोकरी खोली
बस एक फोन मिलाने पे साँप बैठा है

कोई भी लड़की अकेली नज़र नहीं आती
यहाँ हर एक ख़जाने पे साँप बैठा है

  - Muzdum Khan

Nazar Shayari

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    मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
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    Fana Bulandshahri
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    देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ
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    Aalok Shrivastav
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    Subhan Asad
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    दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है
    ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है

    जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे
    उसको मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआफ़ है

    भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं
    हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है

    आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी
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    बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर
    'मुज़दम' ये मेरा सबसे बड़ा एतिराफ़ है
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    बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है
    लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है

    हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए
    फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है

    पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है
    इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है

    वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे
    कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है

    मैं पल में उसके जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर
    मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है

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    ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है
    हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है
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    Muzdum Khan
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    इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नही
    ऐसे खेलों में रिहर्सल नही होती मेरे दोस्त

    उसने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से
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    पगड़ी बड़ी होती है दुपट्टे से लंबाई में
    Muzdum Khan
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    मैं ऐसे अहद में शायर हुआ कि जब सब थे
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    मैं सिर्फ इसलिए ज़िंदा हूँ जब अज़ाब आये
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    हसीन औरतें लश्कर में भर्ती कर दी गईं
    शिकस्त हो गई दुश्मन को क्योंकि अब सब थे

    क़यामत आई तो शिक़वे के तौर पर मैंने
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