Muzdum Khan

Muzdum Khan

@muzdam-khan

Muzdum Khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Muzdum Khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

साल के तीन सौ पैंसठ दिन में एक भी रात नहीं है उस की वो मुझे छोड़ दे और ख़ुश भी रहे इतनी औक़ात नहीं है उस की — Muzdum Khan
तुम नहीं उतरोगी मैं उतरूँगा गहराई में पगड़ी बड़ी होती है दुपट्टे से लंबाई में — Muzdum Khan
न सिर्फ़ ये कि जहन्नुम ख़िताब में भी नहीं अली के मानने वालों के ख़्वाब में भी नहीं — Muzdum Khan
क्या हुआ जो मुझे हम-उम्र मोहब्बत न मिली मेरी ख़्वाहिश भी यही थी कि बड़ी आग लगे — Muzdum Khan
हम दो बंदे हैं और सिगरेट एक अब ख़बर होगी दोस्ती की दोस्त — Muzdum Khan

Ghazal

बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है मैं पल में उस के जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है शादाब गुज़रगाहों पे तेरे काँटो की तिज़ारत होती है वीरान गुज़रगाहों पे मेरी आँखों को छलकना पड़ता है ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है — Muzdum Khan
हमारा दिल जब नहीं लगा तो सवाल पैदा हुआ लगेगा जवाब में हमनें कह दिया ठीक है मगर और क्या लगेगा अ गर कभी तीर चूम कर वो मेरी तरफ़ छोड़ दे कमां से मेरा मुक़द्दर तो इस तरह का है तीर दुश्मन को जा लगेगा कि दोस्त ऐसे मुआशरे में मुआशका चाहते हैं मुझ सेे मैं जिस में थप्पड़ भी खाना चाहूँ तो वो भी बुर्के में आ लगेगा हमारा नक़्शा किराया मेहनत दिमाग लगता है रास्तों पर तुम्हारी तो इनसे दोस्ती है तुम्हारा तो शुक्रिया लगेगा मुशायरों में ग़ज़ल नहीं लोग सिर्फ़ हुलियों को देखते हैं मेरा भी एक दोस्त है जो हँसने के बा'द जॉन एलिया लगेगा — Muzdum Khan
ठहराव तो उस में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी मैं कपड़े बदलते सोचता था, वो मर्द बदल लिया करती थी मुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन सेे जल लिया करती थी आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी — Muzdum Khan