दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है

ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है

जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे
उस को मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआ'फ़ है

भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं
हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है

आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी
उस के लिए मैं जो भी कहूँ इंकिशाफ़ है

बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर
'मुज़दम' ये मेरा सब से बड़ा एतिराफ़ है

— Muzdum Khan

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Aasman Shayari

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