main chahta hoon mohabbat mera vo haal kare | मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे

  - Jawwad Sheikh

मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे
कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो

  - Jawwad Sheikh

Fantasy Shayari

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    मेरी नींदें उड़ा रक्खी है तुम ने
    ये कैसे ख़्वाब दिखलाती हो जानाँ

    किसी दिन देखना मर जाऊँगा मैं
    मेरी क़समें बहुत खाती हो जानाँ
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    Subhan Asad
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    कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी
    कैसे कहूँ किसी की तमन्ना न चाहिए
    Shaad Arfi
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    माना कि सब के सामने मिलने से है हिजाब
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    Akhtar Shirani
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    ख़्वाब इतना भी हसीं मत देखो
    नींद टूटे तो न ये शब गुज़रे
    anupam shah
    तलब करें तो ये आँखें भी इन को दे दूँ मैं
    मगर ये लोग इन आँखों के ख़्वाब माँगते हैं
    Abbas rizvi
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    कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
    मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी
    Javed Akhtar
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    किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से
    Azhar Iqbal
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    'असद' ये शर्त नहीं है कोई मुहब्बत में
    कि जिससे प्यार करो उसकी आरज़ू भी करो
    Subhan Asad
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    और दुआएँ ख़ुदा तलक जाएँ

    ख़्वाब आएँ तो नींद यूँ महके
    आँख से ख़ुशबुएँ छलक जाएँ
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    Ritesh Rajwada
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More by Jawwad Sheikh

As you were reading Shayari by Jawwad Sheikh

    मेरा ख़ज़ाना ज़माने के हाथ जा न लगे
    तुझे किसी की किसी को तेरी हवा न लगे

    मैं एक जिस्म को चखना तो चाहता हूँ मगर
    कुछ इस तरह कि मेरे मुँह को ज़ाएका न लगे

    हमें लगा सो लगा ख़ुद-अज़िय्यती का नशा
    दुआ करो कि तुम्हें बद्दुआ दुआ न लगे

    दुआ करो कि किसी का न दिल लगे तुमसे
    लगे तो और किसी से लगा हुआ न लगे

    हसद किया हो तेरे रिज़्क़ से कभी मैंने
    तो मुझको अपनी कमाई हुई ग़िज़ा न लगे

    हमें ही इश्क़ की तशहीर चाहिए वरना
    पता न लगने दिया जाए तो पता न लगे

    पड़ा रहा मैं किसी और ही बखेड़े में
    बहुत से क़ीमती जज़्बे किसी दिशा न लगे

    बना रहा हूँ तसव्वुर में एक मुद्दत से
    एक ऐसा शहर जिसे कोई रास्ता न लगे

    हमें तो उससे मुहब्बत है और बेहद है
    अगर उसे नहीं लगता तो क्या हुआ न लगे

    किसे ख़ुशी नहीं होती सराहे जाने की
    मगर वो दोस्त ही क्या है जो आइना न लगे

    कभी कभार जो रखने लगे ज़बाँ का भरम
    वो अब भी क्या नहीं लगता मजीद क्या न लगे

    यही कहूँगा कि 'जव्वाद' बच बचा के ज़रा
    अगर किसी का रवैया बरादरा न लगे
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    Jawwad Sheikh
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    सब को बचाओ ख़ुद भी बचो फ़ासला रखो
    अब और कुछ करो न करो फ़ासला रखो

    ख़तरा तो मुफ़्त में भी नहीं लेना चाहिए
    घर से निकल के मोल न लो फ़ासला रखो
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    Jawwad Sheikh
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    न सही ऐश गुज़ारा ही सही
    यानी गर तू नहीं दुनिया ही सही

    छोड़िए कुछ तो मेरा भी मुझ में
    ख़ून का आख़िरी क़तरा ही सही

    ग़ौर तो कीजे मेरी बातों पर
    उम्र में आप से छोटा ही सही

    रंज हम ने भी जुदा पाए हैं
    आप यकता हैं तो यकता ही सही

    मैं बुरा हूँ तो हूँ अब क्या कीजे
    कोई अच्छा है तो अच्छा ही सही

    किस को सीने से लगाऊँ तेरे बाद
    जाते जाते कोई धोका ही सही

    कर कुछ ऐसा कि तुझे याद रखूँ
    भूल जाने का तक़ाज़ा ही सही

    तुम पे कब रोक थी चलते जाते
    मेरी सोचों पे तो पहरा ही सही

    वो किसी तौर न होगा मेरा
    चलो ऐसा है तो ऐसा ही सही

    सुर्ख़ करने लगी हर शय 'जव्वाद'
    याद का रंग सुनहरा ही सही
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    Jawwad Sheikh
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    जो भी जीने के सिलसिले किए थे
    हम ने बस आप के लिए किए थे

    तब कहीं जा के अपनी मर्ज़ी की
    पहले अपनों से मशवरे किए थे

    कभी उस की निगह मयस्सर थी
    कैसे कैसे मुशाहिदे किए थे

    अक़्ल कुछ और कर के बैठ रही
    इश्क़ ने और फ़ैसले किए थे

    बात हम ने सुनी हुई सुनी थी
    काम उस ने किए हुए किए थे

    उसे भी एक ख़त लिखा गया था
    अपने आगे भी आइने किए थे

    यहाँ कुछ भी नहीं है मेरे लिए
    तू ने क्या क्या मुबालग़े किए थे

    अव्वल आने का शौक़ था लेकिन
    काम सारे ही दूसरे किए थे

    बड़ी मुश्किल थी वो घड़ी 'जव्वाद'
    हम ने कब ऐसे फ़ैसले किए थे
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    Jawwad Sheikh
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    नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला
    दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला

    जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है
    इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला

    अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने
    रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला

    मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ?
    वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला

    ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है
    वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला

    जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार
    कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला

    मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ
    अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला

    मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद'
    जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला
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    Jawwad Sheikh
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