Jawwad Sheikh

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Jawwad Sheikh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jawwad Sheikh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

उस की फ़ितरत में न था तर्क-ए-त'अल्लुक़ लेकिन दूसरे शख़्स को इस नहज पे पहुँचा देना — Jawwad Sheikh
मैं ऐसी उम्र से दुख झेलने लगा 'जव्वाद' जो आम तौर पे होती है खेलने वाली — Jawwad Sheikh
अब हमें देख के लगता तो नहीं है लेकिन हम कभी उस के पसंदीदा हुआ करते थे — Jawwad Sheikh
तुम अगर सीखना चाहो मुझे बतला देना आम सा फ़न तो कोई है नहीं तोहफ़ा देना — Jawwad Sheikh
किताब फ़िल्म सफ़र इश्क़ शा'इरी औरत कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढ़ता हुआ मैं — Jawwad Sheikh
कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है — Jawwad Sheikh
अब मिरा ध्यान कहीं और चला जाता है अब कोई फ़िल्म मुकम्मल नहीं देखी जाती — Jawwad Sheikh
टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे — Jawwad Sheikh
मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं — Jawwad Sheikh
किसी के सर्द रवय्ये पे ख़ामुशी का लिहाफ़ ये इंतिक़ाम भी क्या इंतिक़ाम होता है — Jawwad Sheikh
ख़ुद को मसरूफ़ किए रखने की कोशिश करना क्या तेरी याद के ज़ुमरे में नहीं आता है — Jawwad Sheikh
हमें तो उस से मोहब्बत है और बेहद है अगर उसे नहीं लगता तो क्या हुआ न लगे — Jawwad Sheikh
मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं — Jawwad Sheikh
मैं इस ख़याल से जाते हुए उसे न मिला कि रोक लें न कहीं सामने खड़े आँसू — Jawwad Sheikh
मैं चाहता हूँ मोहब्बत मुझे फ़ना कर दे फ़ना भी ऐसा कि जिस की कोई मिसाल न हो — Jawwad Sheikh
लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है — Jawwad Sheikh
क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए — Jawwad Sheikh
अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं — Jawwad Sheikh

Ghazal

मेरा ख़ज़ाना ज़माने के हाथ जा न लगे तुझे किसी की किसी को तेरी हवा न लगे मैं एक जिस्म को चखना तो चाहता हूँ मगर कुछ इस तरह कि मेरे मुँह को ज़ाएका न लगे हमें लगा सो लगा ख़ुद-अज़िय्यती का नशा दुआ करो कि तुम्हें बद-दुआ दुआ न लगे दुआ करो कि किसी का न दिल लगे तुम सेे लगे तो और किसी से लगा हुआ न लगे हसद किया हो तेरे रिज़्क़ से कभी मैं ने तो मुझ को अपनी कमाई हुई ग़िज़ा न लगे हमें ही इश्क़ की तशहीर चाहिए वरना पता न लगने दिया जाए तो पता न लगे पड़ा रहा मैं किसी और ही बखेड़े में बहुत से क़ीमती जज़्बे किसी दिशा न लगे बना रहा हूँ तसव्वुर में एक मुद्दत से एक ऐसा शहर जिसे कोई रास्ता न लगे हमें तो उस सेे मुहब्बत है और बेहद है अगर उसे नहीं लगता तो क्या हुआ न लगे किसे ख़ुशी नहीं होती सराहे जाने की मगर वो दोस्त ही क्या है जो आइना न लगे कभी कभार जो रखने लगे ज़बाँ का भरम वो अब भी क्या नहीं लगता मजीद क्या न लगे यही कहूँगा कि 'जव्वाद' बच बचा के ज़रा अगर किसी का रवैया बरादरा न लगे — Jawwad Sheikh
तो क्या इक हमारे लिए ही मोहब्बत नया तजरबा है जिसे पूछिए वो कहेगा कि जी हाँ बड़ा तजरबा है समझ में न आए तो मेरी ख़मोशी को दिल पर न लेना कि ये अक़्ल वालों की दानिस्त से मावरा तजरबा है कठिन तो बहुत है मगर दिल के रिश्तों को आज़ाद छोड़ो तवक़्क़ो' न बाँधो कि ये इक अज़िय्यत भरा तजरबा है मगर हम मुसिर थे कि हम ने किताबें बहुत पढ़ रखी हैं बड़ों ने कहा भी कि देखो मियाँ तजरबा तजरबा है वो अपनी जगह ख़ुश-गुमाँ थी कि दाइम है पहली मोहब्बत मैं अपने तईं मुतमइन था कि ये दूसरा तजरबा है किसी और के तजरबे से कोई फ़ाएदा क्या उठाएँ मोहब्बत में हर तजरबा ही अलग तरह का तजरबा है — Jawwad Sheikh
करेगा क्या कोई मेरे गले-सड़े आँसू तो क्यूँँ न सूख ही जाएँ पड़े पड़े आँसू जो याद आएँ तो दिल ग़म से फटने लगता है किसी अज़ीज़ की पलकों में वो जड़े आँसू हुआ मैं अपनी तही-दामनी से शर्मिंदा किसी की आँखों में थे ये बड़े बड़े आँसू ख़िज़ाँ में पत्ते भी ऐसे कहाँ झड़े होंगे हमारी आँखों से जूँ हिज्र में झड़े आँसू मैं इस ख़याल से जाते हुए उसे न मिला कि रोक लें न कहीं सामने खड़े आँसू किसी ने एक तरफ़ मर के भी गिला न किया किसी ने देखते ही देखते घड़े आँसू महारत ऐसी कि बस देखते ही रह जाओ निकालता है कोई यूँँ खड़े खड़े आँसू तुम्हें कहा ना कि बस हो गए जुदा हम लोग उखाड़ते हो मियाँ किस लिए गड़े आँसू मगर जो ज़ब्त ने तूफ़ाँ खड़े किए अब के तमाम उम्र बहाएा किए बड़े आँसू अजब गुदाज़ तबीअत है आप की 'जव्वाद' ज़रा सी बात हुई और छलक पड़े आँसू — Jawwad Sheikh
नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ? वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद' जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला — Jawwad Sheikh
नहीं कि पंद-ओ-नसीहत का क़हत पड़ गया है हमारी बात में बरकत का क़हत पड़ गया है तो फिर ये रद्द-ए-मुनाजात की नहूसत क्यूँँ कभी सुना कि इबादत का क़हत पड़ गया है? मलाल ये है कि इस पर कोई मलूल नहीं हमारे शहर में हैरत का क़हत पड़ गया है सुख़न का खोखला होना समझ से बाहर था खुला कि हर्फ़ की हुर्मत का क़हत पड़ गया है कहीं कहीं नज़र आए तो आए मिस्रा-ए-तर नहीं तो शे'र में लज़्ज़त का क़हत पड़ गया है नसीब दिल को भला कब रही फ़रावानी और अब तो वैसे भी मुद्दत का क़हत पड़ गया है मगर अब ऐसी भी कोई अंधेर-नगरी नहीं ये ठीक है कि मोहब्बत का क़हत पड़ गया है नहीं मैं सिर्फ़ ब-ज़ाहिर नहीं हुआ वीरान दरून-ए-ज़ात भी शिद्दत का क़हत पड़ गया है कहाँ गईं मिरे गाँव की रौनक़ें 'जव्वाद' तो क्या यहाँ भी रिवायत का क़हत पड़ गया है — Jawwad Sheikh
ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा — Jawwad Sheikh
मैं चाहता हूँ कि दिल में तिरा ख़याल न हो अजब नहीं कि मिरी ज़िंदगी वबाल न हो मैं चाहता हूँ तू यक-दम ही छोड़ जाए मुझे ये हर घड़ी तिरे जाने का एहतिमाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत पे अब की बार आए ज़वाल ऐसा कि जिस को कभी ज़वाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत सिरे से मिट जाए मैं चाहता हूँ उसे सोचना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मुझे फ़ना कर दे फ़ना भी ऐसा कि जिस की कोई मिसाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मिरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो मैं चाहता हूँ कि इतना ही रब्त रह जाए वो याद आए मगर भूलना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मिरी आँखें नोच ली जाएँ तिरा ख़याल किसी तौर पाएमाल न हो मैं चाहता हूँ कि मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो जाऊँ और इस तरह कि कभी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो मिरी मिसाल हो सब की निगाह में 'जव्वाद' मैं चाहता हूँ किसी और का ये हाल न हो — Jawwad Sheikh
तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ कभी कहता हूँ उस को याद रखना ठीक होगा मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ कोई कब तक किसी की बे-वफ़ाई याद रक्खे बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद' कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ — Jawwad Sheikh
इश्क़ ने जब भी किसी दिल पे हुकूमत की है तो उसे दर्द की मे'राज इनायत की है अपनी ताईद पे ख़ुद अक़्ल भी हैरान हुई दिल ने ऐसे मिरे ख़्वाबों की हिमायत की है शहर-ए-एहसास तिरी याद से रौशन कर के मैं ने हर घर में तिरे ज़िक्र की जुरअत की है मुझ को लगता है कि इंसान अधूरा है अभी तू ने दुनिया में उसे भेज के उजलत की है शहर के तीरा-तरीं घर से वो ख़ुर्शीद मिला जिस की तनवीर में तासीर क़यामत की है सोचता हूँ कि मैं ऐसे में किधर को जाऊँ तेरा मिलना भी कठिन, याद भी शिद्दत की है इस तरह औंधे पड़े हैं ये शिकस्ता जज़्बे जैसे इक वहम ने इन सब की इमामत की है ये जो बिखरी हुई लाशें हैं वरक़ पर 'जव्वाद' ये मिरे ज़ब्त से लफ़्ज़ों ने बग़ावत की है — Jawwad Sheikh
मिरे हवा से पे हावी रही कोई कोई बात कि ज़िंदगी से सिवा ख़ास थी कोई कोई बात ये और बात कि महसूस तक न होने दूँ जकड़ सी लेती है दिल को तिरी कोई कोई बात कोई भी तुझ सा मुझे हू-ब-हू कहीं न मिला किसी किसी में अगरचे मिली कोई कोई बात ख़ुशी हुई कि मुलाक़ात राएगाँ न गई उसे भी मेरी तरह याद थी कोई कोई बात बदन में ज़हर के मानिंद फैल जाती है दिलों में ख़ौफ़ से सहमी हुई कोई कोई बात कभी समझ नहीं पाए कि उस में क्या है मगर चली तो ऐसे कि बस चल पड़ी कोई कोई बात वज़ाहतों में उलझ कर यही खिला 'जव्वाद' ज़रूरी है कि रहे अन-कही कोई कोई बात — Jawwad Sheikh
हज़ार सहरा थे रस्ते में यार क्या करता जो चल पड़ा था तो फ़िक्र-ए-ग़ुबार क्या करता कभी जो ठीक से ख़ुद को समझ नहीं पाया वो दूसरों पे भला ए'तिबार क्या करता चलो ये माना कि इज़हार भी ज़रूरी है सो एक बार किया, बार बार क्या करता इसी लिए तो दर-ए-आइना भी वा न किया जो सो रहे हैं उन्हें होशियार क्या करता वो अपने ख़्वाब की तफ़्सीर ख़ुद न कर पाया जहान भर पे उसे आश्कार क्या करता अगर वो करने पे आता तो कुछ भी कर जाता ये सोच मत कि अकेला शरार क्या करता सिवाए ये कि वो अपने भी ज़ख़्म ताज़ा करे मिरे ग़मों पे मिरा ग़म-गुसार क्या करता बस एक फूल की ख़ातिर बहार माँगी थी रुतों से वर्ना मैं क़ौल-ओ-क़रार क्या करता मिरा लहू ही कहानी का रंग था 'जव्वाद' कहानी-कार उसे रंग-दार क्या करता — Jawwad Sheikh
कहाँ हटता है निगाहों से हटाए हाए वही मंज़र कि जिसे देख न पाए हाए क्या पता सारी तमन्नाएँ धुआँ हो गई हों कुछ निकलता ही नहीं दिल से सिवाए हाए याद आती हुई इक शक्ल पे अल्लाह अल्लाह दिल में उठती हुई हर टीस पे हाए हाए उस गली जा के भी सज्दा न तुम्हें याद रहा सिर्फ़ नज़रें ही झुकाए चले आए हाए सारी मुश्किल ही निहाँ है मिरी आसानी में कौन ये ख़स्ता सी दीवार गिराए हाए रोज़ इक ताज़ा चिलम भर के मुझे दे फ़रहाद और फिर क़ैस मिरे पाँव दबाए हाए दिल के बेकार धड़कने पे कहाँ ख़ुश थे मियाँ हम तो फूले न समाए ब-सदा-ए-हाए जब वो जाए तो मुझे कुछ भी न भाए 'जव्वाद' और जब आए तो कुछ आए न जाए हाए — Jawwad Sheikh
न सही ऐश गुज़ारा ही सही या'नी गर तू नहीं दुनिया ही सही छोड़िए कुछ तो मेरा भी मुझ में ख़ून का आख़िरी क़तरा ही सही ग़ौर तो कीजे मेरी बातों पर उम्र में आप से छोटा ही सही रंज हम ने भी जुदा पाए हैं आप यकता हैं तो यकता ही सही मैं बुरा हूँ तो हूँ अब क्या कीजे कोई अच्छा है तो अच्छा ही सही किस को सीने से लगाऊँ तेरे बा'द जाते जाते कोई धोका ही सही कर कुछ ऐसा कि तुझे याद रखूँ भूल जाने का तक़ाज़ा ही सही तुम पे कब रोक थी चलते जाते मेरी सोचों पे तो पहरा ही सही वो किसी तौर न होगा मेरा चलो ऐसा है तो ऐसा ही सही सुर्ख़ करने लगी हर शय 'जव्वाद' याद का रंग सुनहरा ही सही — Jawwad Sheikh
इधर ये हाल कि छूने का इख़्तियार नहीं उधर वो हुस्न कि आँखों पे ए'तिबार नहीं मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं तुम अपनी हालत-ए-ग़ुर्बत का ग़म मनाते हो ख़ुदा का शुक्र करो मुझ से बे-दयार नहीं मैं सोचता हूँ कि वो भी दुखी न हो जाए ये दास्तान कोई ऐसी ख़ुश-गवार नहीं तो क्या यक़ीन दिलाने से मान जाओगे? यक़ीं दिलाऊँ कि ये हिज्र दिल पे बार नहीं क़दम क़दम पे नई ठोकरें हैं राहों में दयार-ए-इश्क़ में कोई भी कामगार नहीं यही सुकून मिरी बे-कली न बन जाए कि ज़िंदगी में कोई वजह-ए-इन्तिज़ार नहीं ख़ुदा के बारे में इक दिन ज़रूर सोचेंगे अभी तो ख़ुद से तअल्लुक़ भी उस्तुवार नहीं गिला तो मुझ से वो करता है इस तरह 'जव्वाद' कि जैसे मैं तो जुदाई में सोगवार नहीं — Jawwad Sheikh
मौला किसी को ऐसा मुक़द्दर न दीजियो दिलबर नहीं तो फिर कोई दीगर न दीजियो अपने सवाल सहल न लगने लगें उसे आते भी हों जवाब तो फ़र-फ़र न दीजियो चादर वो दीजियो उसे जिस पर शिकन न आए जिस पर शिकन न आए वो बिस्तर न दीजियो आए न कार-ए-शुक्र-गुज़ारी पे कोई हर्फ़ जब दीजियो तो ज़र्फ़ से बढ़ कर न दीजियो बिखराओ कुछ नहीं भी सिमटते मिरे अज़ीज़ अपने किसी ख़याल को पैकर न दीजियो तफ़रीक़ रहने दीजियो तारीफ़-ओ-तंज़ में अब के शराब ज़हर मिला कर न दीजियो या दिल से तर्क कीजियो दस्तार का ख़याल या उस मुआ'मले में कभी सर न दीजियो कहियो कि तू ने ख़ूब बनाई है काएनात लेकिन उसे लिखाई के नंबर न दीजियो मेआ'र से सिवा यहाँ रफ़्तार चाहिए 'जव्वाद' उस को आख़िरी ओवर न दीजियो — Jawwad Sheikh