to kya ye aakhiri KHvaahish hai achha bhool jaaun | तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ

  - Jawwad Sheikh

तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ
जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ

तो क्या ये दूसरा ही 'इश्क़ असली 'इश्क़ समझूँ
तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ

तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना
कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ

कभी कहता हूँ उसको याद रखना ठीक होगा
मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ

ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो
मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ

है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत
मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ

कोई कब तक किसी की बे-वफ़ाई याद रक्खे
बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ

तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद'
कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ

  - Jawwad Sheikh

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