Taimur Hasan

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    तुझे ज़िंदगी का शऊर था तेरा क्या बना
    तू ख़मोश क्यूँ है मुझे बता तेरा क्या बना

    नई मंज़िलों की तलाश थी सो बिछड़ गए
    मैं बिछड़ के तुझ से भटक गया तेरा क्या बना

    मुझे इल्म था कि शिकस्त मेरा नसीब है
    तू उमीदवार था जीत का तेरा क्या बना

    मैं मुक़ाबले में शरीक था फ़क़त इसलिए
    कोई आ के मुझ से ये पूछता तेरा क्या बना

    जो नसीब से तेरी जंग थी वो मेरी भी थी
    मैं तो कामयाब न हो सका तेरा क्या बना

    तुझे देख कर तो मुझे लगा था कि ख़ुश है तू
    तेरे बोलने से पता चला तेरा क्या बना

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    तुझे ख़बर है तुझे सताता हूँ इस बिना पर
    तू बोलता है तो हज़ उठाता हूँ इस बिना पर

    मिरा लहू मेरी आस्तीं पर लगा हुआ है
    मैं अपना क़ातिल क़रार पाता हूँ इस बिना पर

    कभी कभी हाल के हक़ाएक़ मुझे सताएँ
    मैं अपने माज़ी में रहने जाता हूँ इस बिना पर

    वो अपनी आँखों से देख कर मेरा इल्म परखें
    मैं अपने बच्चों को सब बताता हूँ इस बिना पर

    उसे बनाया है मैं ने ये कम नहीं किसी से
    चराग़ सूरज को मैं दिखाता हूँ इस बिना हर

    वो उस में रहता है अपना किरदार ढूँढता है
    मैं हर कहानी उसे सुनाता हूँ इस बिना पर

    मुझे ख़बर है वो सर ता-पा शाइ'री है 'तैमूर'
    ग़ज़ल का हिस्सा उसे बनाता हूँ इस बिना पर

    Taimur Hasan
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    ये लोग करते हैं मंसूब जो बयाँ तुझ से
    समझते हैं मुझे कर देंगे बद-गुमाँ तुझ से

    जहाँ जहाँ मुझे तेरी अना बचाना थी
    शिकस्त खाई है मैं ने वहाँ वहाँ तुझ से

    मिरे शजर मुझे बाज़ू हिला के रुख़्सत कर
    कहाँ मिलेंगे भला मुझ को मेहरबाँ तुझ से

    ख़ुदा करे कि हो ताबीर ख़्वाब की अच्छी
    मिला हूँ रात मैं फूलों के दरमियाँ तुझ से

    जुदाइयों का सबब सिर्फ़ एक था 'तैमूर'
    तवक़्क़ुआत ज़ियादा थीं जान-ए-जाँ तुझ से

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    हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं
    अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं

    सूरज के उस जानिब बसने वाले लोग
    अक्सर हम को पास बुलाया करते हैं

    यूँही ख़ुद से रूठा करते हैं पहले
    देर तलक फिर ख़ुद को मनाया करते हैं

    चुप रहते हैं उस के सामने जा कर हम
    यूँ उस को चख याद दिलाया करते हैं

    नींदों के वीरान जज़ीरे पर हर शब
    ख़्वाबों का इक शहर बसाया करते हैं

    इन ख़्वाबों की क़ीमत हम से पूछ कि हम
    इन के सहारे उम्र बिताया करते हैं

    अब तो कोई भी दूर नहीं तो फिर 'तैमूर'
    हम ख़त किस के नाम लिखाया करते हैं

    Taimur Hasan
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    वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता
    यही सलीक़ा उसे सब में मो'तबर करता

    न जाने कितनी ग़लत-फ़हमियाँ जनम लेतीं
    मैं अस्ल बात से पहलू-तही अगर करता

    मैं सोचता हूँ कहाँ बात इस क़दर बढ़ती
    अगर मैं तेरे रवय्ये से दर-गुज़र करता

    मिरा अदू तो था इल्म-उल-कलाम का माहिर
    मिरे ख़िलाफ़ ज़माने को बोल कर करता

    अकेले जंग लड़ी जीत ली तो सब ने कहा
    पहुँचते हम भी अगर तू हमें ख़बर करता

    मिरी भी छाँव न होती अगर तुम्हारी तरह
    मैं इंहिसार बुज़ुर्गों के साए पर करता

    सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है
    ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता

    गए दिनों में ये मामूल था मिरा 'तैमूर'
    ज़ियादा वक़्त मैं इक ख़्वाब में बसर करता

    Taimur Hasan
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    वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई
    अभी तो रंग जमा था कि रात बीत गई

    मिरी तरफ़ चली आती है नींद ख़्वाब लिए
    अभी ये मुज़्दा सुना था कि रात बीत गई

    मैं रात ज़ीस्त का क़िस्सा सुनाने बैठ गया
    अभी शुरूअ किया था कि रात बीत गई

    यहाँ तो चारों तरफ़ अब तलक अंधेरा है
    किसी ने मुझ से कहा था कि रात बीत गई

    ये क्या तिलिस्म ये पल भर में रात आ भी गई
    अभी तो मैं ने सुना था कि रात बीत गई

    शब आज की वो मिरे नाम करने वाला है
    ये इंकिशाफ़ हुआ था कि रात बीत गई

    नवेद-ए-सुब्ह जो सब को सुनाता फिरता था
    वो मुझ से पूछ रहा था कि रात बीत गई

    उठे थे हाथ दुआ के लिए कि रात कटे
    दुआ में ऐसा भी क्या था कि रात बीत गई

    ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की
    मगर ये ग़म भी सिवा था कि रात बीत गई

    Taimur Hasan
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    वो जो मुमकिन न हो मुमकिन ये बना देता है
    ख़्वाब दरिया के किनारों को मिला देता है

    ज़िंदगी भर की रियाज़त मिरी बे-कार गई
    इक ख़याल आया था बदले में वो क्या देता है

    अब मुझे लगता है दुश्मन मिरा अपना चेहरा
    मुझ से पहले ये मिरा हाल बता देता है

    चंद जुमले वो अदा करता है ऐसे ढब से
    मेरे अफ़्कार की बुनियाद हिला देता है

    ये भी एजाज़-ए-मोहब्बत है कि रोने वाला
    रोते रोते तुझे हँसने की दुआ देता है

    ज़िंदगी जंग है आसाब की और ये भी सुनो
    इश्क़ आसाब को मज़बूत बना देता है

    बैठे बैठे उसे क्या होता है जाने 'तैमूर'
    जलता सिगरेट वो हथेली पे बुझा देता है

    ये जहाँ इस लिए अच्छा नहीं लगता 'तैमूर'
    जब भी देता है मुझे तेरा गिला देता है

    Taimur Hasan
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    नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँगा
    करूँगा मैं इश्क़ पर तमाशा नहीं करूँगा

    मिरी मोहब्बत भी ख़ास है क्यूँकि ख़ास हूँ मैं
    सो आम लोगों में ज़िक्र इस का नहीं करूँगा

    उसे बताओ फ़रार का नाम तो नहीं इश्क़
    जो कह रहा है मैं कार-ए-दुनिया नहीं करूँगा

    कभी न सोचा था गुफ़्तुगू भी करूँगा घंटों
    और अपनी बातों में ज़िक्र तेरा नहीं करूँगा

    इरादतन जो किया है अब तक ग़लत किया है
    सो अब कोई काम बिल-इरादा नहीं करूँगा

    तुझे मैं अपना नहीं समझता इसी लिए तो
    ज़माने तुझ से मैं कोई शिकवा नहीं करूँगा

    मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी
    मैं ख़ुद को साबित करूँगा दावा नहीं करूँगा

    अगर मैं हारा तो मान लूँगा शिकस्त अपनी
    तिरी तरह से कोई बहाना नहीं करूँगा

    अगर किसी मस्लहत में पीछे हटा हूँ 'तैमूर'
    तो मत समझना कि अब मैं हमला नहीं करूँगा

    Taimur Hasan
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    मोती नहीं हूँ रेत का ज़र्रा तो मैं भी हूँ
    दरिया तिरे वजूद का हिस्सा तो मैं भी हूँ

    ऐ क़हक़हे बिखेरने वाले तू ख़ुश भी है
    हँसने की बात छोड़ कि हँसता तो मैं भी हूँ

    मुझ में और उस में सिर्फ़ मुक़द्दर का फ़र्क़ है
    वर्ना वो शख़्स जितना है उतना तो मैं भी हूँ

    उस की तू सोच दुनिया में जिस का कोई नहीं
    तू किस लिए उदास है तेरा तो मैं भी हूँ

    इक एक कर के डूबते तारे बुझा गए
    मुझ को भी डूबना है सितारा तो मैं भी हूँ

    इक आइने में देख के आया है ये ख़याल
    मैं क्यूँ न उस से कह दूँ कि तुझ सा तो मैं भी हूँ

    Taimur Hasan
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    मुझ को कहानियाँ न सुना शहर को बचा
    बातों से मेरा दिल न लुभा शहर को बचा

    Taimur Hasan
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