तुझे ज़िंदगी का शऊर था तेरा क्या बना
तू ख़मोश क्यूँँ है मुझे बता तेरा क्या बना
नई मंज़िलों की तलाश थी सो बिछड़ गए
मैं बिछड़ के तुझ से भटक गया तेरा क्या बना
मुझे इल्म था कि शिकस्त मेरा नसीब है
तू उमीदवार था जीत का तेरा क्या बना
मैं मुक़ाबले में शरीक था फ़क़त इसलिए
कोई आ के मुझ से ये पूछता तेरा क्या बना
जो नसीब से तेरी जंग थी वो मेरी भी थी
मैं तो कामयाब न हो सका तेरा क्या बना
तुझे देख कर तो मुझे लगा था कि ख़ुश है तू
तेरे बोलने से पता चला तेरा क्या बना
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