यही बहुत है कि दिल उसको ढूँढ लाया है
    किसी के साथ सही वो नज़र तो आया है

    करूँ शिकायतें तकता रहूँ कि प्यार करूँ
    गई बहार की सूरत वो लौट आया है

    वो सामने था मगर ये यक़ीं न आता था
    वो आप हैं कि मेरी ख़्वाहिशों का साया है

    अज़ाब धूप के कैसे हैं बारिशें क्या हैं
    फ़सील-ए-जिस्म गिरी जब तो होश आया है

    मैं क्या करूँगा अगर वो न मिल सका 'अमजद'
    अभी अभी मेरे दिल में ख़याल आया है
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    Amjad Islam Amjad
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    वो जो गीत तुम ने सुना नहीं मेरी उम्र भर का रियाज़ था
    मेरे दर्द की थी वो दास्ताँ जिसे तुम हँसी में उड़ा गए
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    वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
    दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा
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    अपने घर की खिड़की से मैं आसमान को देखूँगा
    जिस पर तेरा नाम लिखा है उस तारे को ढूँडूँगा

    तुम भी हर शब दिया जला कर पलकों की दहलीज़ पे रखना
    मैं भी रोज़ इक ख़्वाब तुम्हारे शहर की जानिब भेजूँगा

    हिज्र के दरिया में तुम पढ़ना लहरों की तहरीरें भी
    पानी की हर सत्र पे मैं कुछ दिल की बातें लिखूँगा

    जिस तन्हा से पेड़ के नीचे हम बारिश में भीगे थे
    तुम भी उस को छू के गुज़रना मैं भी उस से लिपटूँगा

    ख़्वाब मुसाफ़िर लम्हों के हैं साथ कहाँ तक जाएँगे
    तुम ने बिल्कुल ठीक कहा है मैं भी अब कुछ सोचूँगा

    बादल ओढ़ के गुज़रूँगा मैं तेरे घर के आँगन से
    क़ौस-ए-क़ुज़ह के सब रंगों में तुझ को भीगा देखूँगा

    बे-मौसम बारिश की सूरत देर तलक और दूर तलक
    तेरे दयार-ए-हुस्न पे मैं भी किन-मिन किन-मिन बरसूँगा

    शर्म से दोहरा हो जाएगा कान पड़ा वो बुंदा भी
    बाद-ए-सबा के लहजे में इक बात में ऐसी पूछूँगा

    सफ़्हा सफ़्हा एक किताब-ए-हुस्न सी खुलती जाएगी
    और उसी की लय में फिर मैं तुम को अज़बर कर लूँगा

    वक़्त के इक कंकर ने जिस को अक्सों में तक़्सीम किया
    आब-ए-रवाँ में कैसे 'अमजद' अब वो चेहरा जोड़ूँगा
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    Amjad Islam Amjad
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    थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी
    पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी

    ये ज़िंदगी है यहाँ इस तरह ही होता है
    सभी ने बोझ से लादे हैं कुछ उतारे भी

    सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे
    हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी

    किसी का अपना मोहब्बत में कुछ नहीं होता
    कि मुश्तरक हैं यहाँ सूद भी ख़सारे भी

    बिगाड़ पर है जो तन्क़ीद सब बजा लेकिन
    तुम्हारे हिस्से के जो काम थे सँवारे भी

    बड़े सुकून से डूबे थे डूबने वाले
    जो साहिलों पे खड़े थे बहुत पुकारे भी

    प जैसे रेल में दो अजनबी मुसाफ़िर हों
    सफ़र में साथ रहे यूँ तो हम तुम्हारे भी

    यही सही तिरी मर्ज़ी समझ न पाए हम
    ख़ुदा गवाह कि मुबहम थे कुछ इशारे भी

    यही तो एक हवाला है मेरे होने का
    यही गिराती है मुझ को यही उतारे भी

    इसी ज़मीन में इक दिन मुझे भी सोना है
    इसी ज़मीं की अमानत हैं मेरे प्यारे भी

    वो अब जो देख के पहचानते नहीं 'अमजद'
    है कल की बात ये लगते थे कुछ हमारे भी
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    भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा
    सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा

    सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे
    कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा

    बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम
    हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा

    चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत
    ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा

    दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे
    वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा

    बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी
    कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा

    नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल
    तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा

    इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ
    जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा
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    ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
    जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते

    हज़ार जाल लिए घूमती फिरे दुनिया
    तिरे असीर किसी के हुआ नहीं करते

    ये आइनों की तरह देख-भाल चाहते हैं
    कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते

    वफ़ा की आँच सुख़न का तपाक दो इन को
    दिलों के चाक रफ़ू से सिला नहीं करते

    जहाँ हो प्यार ग़लत-फ़हमियाँ भी होती हैं
    सो बात बात पे यूँ दिल बुरा नहीं करते

    हमें हमारी अनाएँ तबाह कर देंगी
    मुकालमे का अगर सिलसिला नहीं करते

    जो हम पे गुज़री है जानाँ वो तुम पे भी गुज़रे
    जो दिल भी चाहे तो ऐसी दुआ नहीं करते

    हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है
    तमाम ग़ुंचे तो 'अमजद' खिला नहीं करते
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    Amjad Islam Amjad
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    चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन
    क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन

    राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब
    दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन

    पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूँ
    बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन

    ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरी दिल की गली से
    फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन

    गुज़रें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे
    इस तरह मिरी रात को चमकाओ किसी दिन

    मैं अपनी हर इक साँस उसी रात को दे दूँ
    सर रख के मिरे सीने पे सो जाओ किसी दिन
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    Amjad Islam Amjad
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    कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
    वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा

    वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
    दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा

    मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तिरी आस तेरे गुमान में
    सबा कह गई मिरे कान में मिरे साथ आ उसे भूल जा

    किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ'द कुछ भी नहीं है कम
    तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा

    कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं
    कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा

    क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में
    वो जो दर्द था तिरे बख़्त में सो वो हो गया उसे भूल जा

    तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो
    वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा
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    Amjad Islam Amjad
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    कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
    वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा
    Amjad Islam Amjad
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