ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो न सके
ये रंज है कि कोई दरमियान में भी न था
ये रंज है कि कोई दरमियान में भी न था
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ये कौन आने जाने लगा उस गली में अब
ये कौन मेरी दास्ताँ दोहराने वाला है
ये कौन मेरी दास्ताँ दोहराने वाला है
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उसी मक़ाम पे कल मुझ को देख कर तन्हा
बहुत उदास हुए फूल बेचने वाले
बहुत उदास हुए फूल बेचने वाले
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'जमाल' अब तो यही रह गया पता उस का
भली सी शक्ल थी अच्छा सा नाम था उस का
भली सी शक्ल थी अच्छा सा नाम था उस का
फिर एक साया दर-ओ-बाम पर उतर आया
दिल-ओ-निगाह में फिर ज़िक्र छिड़ गया उस का
किसे ख़बर थी कि ये दिन भी देखना होगा
अब ए'तिबार भी दिल को नहीं रहा उस का
जो मेरे ज़िक्र पर अब क़हक़हे लगाता है
बिछड़ते वक़्त कोई हाल देखता उस का
मुझे तबाह किया और सब की नज़रों में
वो बे-क़ुसूर रहा ये कमाल था उस का
सो किस से कीजिए ज़िक्र-नज़ाकत-ए-ख़द-ओ-ख़ाल
कोई मिला ही नहीं सूरत-आश्ना उस का
जो साया साया शब-ओ-रोज़ मेरे साथ रहा
गली गली में पता पूछता फिरा उस का
'जमाल' उस ने तो ठानी थी उम्र-भर के लिए
ये चार रोज़ में क्या हाल हो गया उस का
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जब कभी ख़्वाब की उम्मीद बँधा करती है
नींद आँखों में परेशान फिरा करती है
नींद आँखों में परेशान फिरा करती है
याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है
देख बे-चारगी-ए-कू-ए-मोहब्बत कोई दम
साए के वास्ते दीवार दुआ करती है
सूरत-ए-दिल बड़े शहरों में रह-ए-यक-तर्फ़ा
जाने वालों को बहुत याद किया करती है
दो उजालों को मिलाती हुई इक राह-गुज़ार
बे-चराग़ी के बड़े रंज सहा करती है
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वो लोग मेरे बहुत प्यार करने वाले थे
गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
नई रुतों में दुखों के भी सिलसिले हैं नए
वो ज़ख़्म ताज़ा हुए हैं जो भरने वाले थे
ये किस मक़ाम पे सूझी तुझे बिछड़ने की
कि अब तो जा के कहीं दिन सँवरने वाले थे
हज़ार मुझ से वो पैमान-ए-वस्ल करता रहा
पर उस के तौर-तरीक़े मुकरने वाले थे
तुम्हें तो फ़ख़्र था शीराज़ा-बंदी-ए-जाँ पर
हमारा क्या है कि हम तो बिखरने वाले थे
तमाम रात नहाएा था शहर बारिश में
वो रंग उतर ही गए जो उतरने वाले थे
उस एक छोटे से क़स्बे पे रेल ठहरी नहीं
वहाँ भी चंद मुसाफ़िर उतरने वाले थे
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