सुनो कि अब हम गुलाब देंगे गुलाब लेंगे
मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा
मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा
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सूरज ढलता है
और बम गिरता है
और बम गिरता है
और बम गिरते हैं
सूरज ढलने से
सूरज चढ़ने तक
चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर
बम गिरते रहते हैं
लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती
पहले देती थी
अब कोई नहीं रोता
गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों
में
गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा
और चारों जानिब
ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए
दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील
और डरे डरे कुछ लोग
उधर उधर से झाँकते हैं
उधर उधर छुप जाते हैं
बम गिरता है
लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है
बुझता है
जलता है
डर ग़ुस्से में ढलता है
रॉकेट चलता है
रॉकेट चलता है
दुनिया चीख़ती है
और बम गिरता है
तो
किसी को सुनाई नहीं देता
किसी को दिखाई नहीं देता
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तू ने क्यूँ अपने गालों पे सरसों मली
तू ने क्यूँ अपनी आँखों में चूना भरा
तू ने क्यूँ अपनी आँखों में चूना भरा
तेरी गोयाई किस दश्त के भेड़िये ले गए
बोलता क्यूँ नहीं
बोलता क्यूँ नहीं तिफ़्ल-ए-मासूम तो कब से बीमार है
कैसा आज़ार है जिस ने तेरी शबों से तिरी नींद तेरे दिनों से
खिलौने चुराए
तू सोया नहीं है मगर जागता क्यूँ नहीं
देखता क्यूँ नहीं तेरे बाबा के बालों में खुजली है और उँगलियाँ झड़ चुकी हैं
हिसाब-ए-शब-ओ-रोज़ करते हुए
तेरी अम्माँ के रा'शा-ज़दा हाथ ख़ुश-हालियाँ ढूँडते ढूँडते
इन धुले बर्तनों में पड़े रह गए
सुब्ह-ए-ताबीर ने शाख़ पर सब्ज़ होने की हसरत लिखी
आँख को मोतिया दे दिया
देखता क्यूँ नहीं आज बाज़ार में जश्न-ए-इफ़्लास है
शहर की भूक चोरी हुई
और ख़बरों ने अख़बार गुम कर दिया
लोग रोते रहे
लोग हँसते रहे
तेरे बिस्तर पे अश्कों की चम्पा खिली
और तू चुप रहा
तेरे माथे पे मुस्कान का इत्र छिड़का गया
और तू चुप रहा
मेरी हंडिया जली
मेरा चूल्हा बुझा
मेरी झोली से हर्फ़-ए-दुआ गिर गया
मेरे बच्चे तू लब खोलता क्यूँ नहीं
बोलता क्यूँ नहीं
Read Fullबोलता क्यूँ नहीं
बोलता क्यूँ नहीं तिफ़्ल-ए-मासूम तो कब से बीमार है
कैसा आज़ार है जिस ने तेरी शबों से तिरी नींद तेरे दिनों से
खिलौने चुराए
तू सोया नहीं है मगर जागता क्यूँ नहीं
देखता क्यूँ नहीं तेरे बाबा के बालों में खुजली है और उँगलियाँ झड़ चुकी हैं
हिसाब-ए-शब-ओ-रोज़ करते हुए
तेरी अम्माँ के रा'शा-ज़दा हाथ ख़ुश-हालियाँ ढूँडते ढूँडते
इन धुले बर्तनों में पड़े रह गए
सुब्ह-ए-ताबीर ने शाख़ पर सब्ज़ होने की हसरत लिखी
आँख को मोतिया दे दिया
देखता क्यूँ नहीं आज बाज़ार में जश्न-ए-इफ़्लास है
शहर की भूक चोरी हुई
और ख़बरों ने अख़बार गुम कर दिया
लोग रोते रहे
लोग हँसते रहे
तेरे बिस्तर पे अश्कों की चम्पा खिली
और तू चुप रहा
तेरे माथे पे मुस्कान का इत्र छिड़का गया
और तू चुप रहा
मेरी हंडिया जली
मेरा चूल्हा बुझा
मेरी झोली से हर्फ़-ए-दुआ गिर गया
मेरे बच्चे तू लब खोलता क्यूँ नहीं
बोलता क्यूँ नहीं
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खिड़कियाँ खोल दो
ज़ब्त की खिड़कियाँ खोल दो
ज़ब्त की खिड़कियाँ खोल दो
मैं खिलूँ जून की दोपहर में
दिसम्बर की शब में
सभी मौसमों के कटहरे में अपनी नफ़ी का मैं इसबात बन कर खिलूँ
ख़्वाहिशों
नींद की जंगली झाड़ियों
अपने ही ख़ून की दलदलों में खिलूँ
भाइयों की फटी आस्तीनों में
बहनों के सज्दों में
माँ-बाप के बे-ज़बाँ दर्द में अध-जले सिगरटों का तमाशा बनूँ
हर नई सुब्ह के बस-स्टापों पे ठहरी हुई लड़कियों की किताबों में
मस्लूब होने चलूँ
मैं अपाहिज दिनों की नदामत बनूँ
खिड़कियाँ खोल दो
छोड़ दो रास्ते
शहर-ए-बे-ख़्वाब में घूमने दो मुझे
सुब्ह से शाम तक शाम से सुब्ह तक
उस अँधेरे की इक इक करन चूमने दो मुझे
जिस में बेज़ार लम्हों की साज़िश हुई
और दहलों से नहले बड़े हो गए
जिस में बे-नूर किरनों की बारिश हुई
बहर-ए-शब-ज़ाद में जो सफ़ीने उतारे भँवर बन गए
ख़्वाब में ख़्वाब के फूल खिलने लगे खिड़कियाँ खोल दो
जागने दो मुझे
Read Fullदिसम्बर की शब में
सभी मौसमों के कटहरे में अपनी नफ़ी का मैं इसबात बन कर खिलूँ
ख़्वाहिशों
नींद की जंगली झाड़ियों
अपने ही ख़ून की दलदलों में खिलूँ
भाइयों की फटी आस्तीनों में
बहनों के सज्दों में
माँ-बाप के बे-ज़बाँ दर्द में अध-जले सिगरटों का तमाशा बनूँ
हर नई सुब्ह के बस-स्टापों पे ठहरी हुई लड़कियों की किताबों में
मस्लूब होने चलूँ
मैं अपाहिज दिनों की नदामत बनूँ
खिड़कियाँ खोल दो
छोड़ दो रास्ते
शहर-ए-बे-ख़्वाब में घूमने दो मुझे
सुब्ह से शाम तक शाम से सुब्ह तक
उस अँधेरे की इक इक करन चूमने दो मुझे
जिस में बेज़ार लम्हों की साज़िश हुई
और दहलों से नहले बड़े हो गए
जिस में बे-नूर किरनों की बारिश हुई
बहर-ए-शब-ज़ाद में जो सफ़ीने उतारे भँवर बन गए
ख़्वाब में ख़्वाब के फूल खिलने लगे खिड़कियाँ खोल दो
जागने दो मुझे
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सुनो तो कहूँ
तुम कहो तो कहूँ ज़र्फ़ की दास्ताँ
खेतियों को गिला बादलों से नहीं सूरजों से भी था
बाज़ूओं से भी था हल पकड़ने से पहले ही जो थक गए
किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़ पर आब-ए-नमकीन जम सा गया
रक़्स थम सा गया
एड़ियाँ घूमते घूमते रुक गईं
अश्क रुख़्सार की घाटियों से गिरा मुंजमिद हो गया
रंग ख़ुश्बू बना तो हवा चल पड़ी
ख़्वाब नाता बना तो खुली खिड़कियों में सलाख़ें उगीं
हाथ ज़ख़्मी हुए
किस के कश्कोल से कितने सिक्के गिरे
हिज्र कैसा परिंदे की आँखों में था
घाव कैसे पहाड़ों के सीने पे थे
आइना गुंग था
फ़र्श पर अक्स धम से गिरा
किर्चियाँ हो गया
तुम कहो तो गिनूँ
तुम कहो तो चुनूँ
तुम कहो तो सुनूँ इन खुले फूल की धड़कनें
गुम-शुदा तितलियों की सदा
ज़र्द टहनी के होंटों पे रक्खी हुई बद-दुआ'
आसमानों की दहलीज़ पर फेंक दूँ
तुम कहो तो दिखाऊँ तुम्हें
इक तमाशा कि जो मेरी मुट्ठी में है
एक गर्दन कि जो ग़म के फंदे में है
साँस चलती भी है और चलती नहीं
जाँ निकलती नहीं
Read Fullतुम कहो तो कहूँ ज़र्फ़ की दास्ताँ
खेतियों को गिला बादलों से नहीं सूरजों से भी था
बाज़ूओं से भी था हल पकड़ने से पहले ही जो थक गए
किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़ पर आब-ए-नमकीन जम सा गया
रक़्स थम सा गया
एड़ियाँ घूमते घूमते रुक गईं
अश्क रुख़्सार की घाटियों से गिरा मुंजमिद हो गया
रंग ख़ुश्बू बना तो हवा चल पड़ी
ख़्वाब नाता बना तो खुली खिड़कियों में सलाख़ें उगीं
हाथ ज़ख़्मी हुए
किस के कश्कोल से कितने सिक्के गिरे
हिज्र कैसा परिंदे की आँखों में था
घाव कैसे पहाड़ों के सीने पे थे
आइना गुंग था
फ़र्श पर अक्स धम से गिरा
किर्चियाँ हो गया
तुम कहो तो गिनूँ
तुम कहो तो चुनूँ
तुम कहो तो सुनूँ इन खुले फूल की धड़कनें
गुम-शुदा तितलियों की सदा
ज़र्द टहनी के होंटों पे रक्खी हुई बद-दुआ'
आसमानों की दहलीज़ पर फेंक दूँ
तुम कहो तो दिखाऊँ तुम्हें
इक तमाशा कि जो मेरी मुट्ठी में है
एक गर्दन कि जो ग़म के फंदे में है
साँस चलती भी है और चलती नहीं
जाँ निकलती नहीं
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वो ख़ामोश थी
अपने दोज़ख़ में जलती हुई
अपने दोज़ख़ में जलती हुई
नील-गूँ पानियों के शिकंजे में जकड़ी हुई
इक मचलती हुई मौज-ए-महताब की सम्त लपकी
मगर
रेत पर आ गिरी सीप उगलती हुई
ख़ामुशी के भँवर से निकलती हुई
वो हँसी और हँसी
ब्रज़िअर में से बाहर फिसलती हुई
अब वो लड़की नहीं सिर्फ़ अँगड़ाई थी
इक तवानाई थी
नीम-वा आँख में कसमसाती हुई
हाथ मलती हुई
इक समुंदर था बिफरा हुआ
इक शब थी न ढलती हुई
Read Fullइक मचलती हुई मौज-ए-महताब की सम्त लपकी
मगर
रेत पर आ गिरी सीप उगलती हुई
ख़ामुशी के भँवर से निकलती हुई
वो हँसी और हँसी
ब्रज़िअर में से बाहर फिसलती हुई
अब वो लड़की नहीं सिर्फ़ अँगड़ाई थी
इक तवानाई थी
नीम-वा आँख में कसमसाती हुई
हाथ मलती हुई
इक समुंदर था बिफरा हुआ
इक शब थी न ढलती हुई
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अधूरी लड़कियो
तुम अपने कमरों में पुराने साल के बोसीदा कैलन्डर सजा कर सोचती हो
तुम अपने कमरों में पुराने साल के बोसीदा कैलन्डर सजा कर सोचती हो
ये बदन 'उम्रों की साज़िश में न आएँगे
तुम्हें किस ने बताया है
घड़ी की सूइयों को रोकने से दौड़ता और हाँफता सूरज मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा
अफ़्लाक पर जम जाएगा
तुम्हें मालूम है उर्यानियों को ढाँप कर तुम और उर्यां हो रही हो
रोज़ इन आँखों की तिकड़ी में तुम्हारे जिस्म तुलते हैं
हर इक शब हॉस्टल में ताश की बाज़ी में तुम को जीत कर इक जश्न होता है
हमारी ख़्वाब-गाहों में तुम्हारे ख़्वाब रौशन हैं
चली आओ
कि बाहर बर्फ़ है
और अब हमें तुम से जुदा बिस्तर कहाँ तस्लीम करते हैं
चली आओ कि 'उम्रें राएगाँ होने से बच जाएँ!
Read Fullतुम्हें किस ने बताया है
घड़ी की सूइयों को रोकने से दौड़ता और हाँफता सूरज मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा
अफ़्लाक पर जम जाएगा
तुम्हें मालूम है उर्यानियों को ढाँप कर तुम और उर्यां हो रही हो
रोज़ इन आँखों की तिकड़ी में तुम्हारे जिस्म तुलते हैं
हर इक शब हॉस्टल में ताश की बाज़ी में तुम को जीत कर इक जश्न होता है
हमारी ख़्वाब-गाहों में तुम्हारे ख़्वाब रौशन हैं
चली आओ
कि बाहर बर्फ़ है
और अब हमें तुम से जुदा बिस्तर कहाँ तस्लीम करते हैं
चली आओ कि 'उम्रें राएगाँ होने से बच जाएँ!
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हम ख़िज़ाँ की ग़ुदूद से चल कर
ख़ुद दिसम्बर की कोख तक आए
ख़ुद दिसम्बर की कोख तक आए
हम को फ़ुटपाथ पर हयात मिली
हम पतंगों पे लेट कर रोए
सूरजों ने हमारे होंटों पर
अपने होंटों का शहद टपकाया
और हमारी शिकम तसल्ली को
जून की छातियों में दूध आया
बर्फ़ बिस्तर बनी हमारे लिए
और दोज़ख़ के सुर्ख़ रेशम से
हम ने अपने लिए लिहाफ़ बुने
ज़र्द शिरयान को धुएँ से भरा
फेफड़ों पर सियाह राख मली
नागा-साकी में फूल काश्त किए
नज़्म बेरूत में मुकम्मल की
लोरका को कलाई पर बाँधा
हो-ची-मिन्ह को नियाम में रखा
साढ़े लेनिन बजे स्कूल गए
सुब्ह-ए-ईसा को शाम में रक्खा
अरमुग़ान-ए-हिजाज़ में सोए
होलीवुड की अज़ान पर जागे
डाइरी में सुधार था लिखा
दर्द को फ़लसफ़े की लोरी दी
ज़ख़्म पर शाइ'री का फाहा रक्खा
तन मशीनों की थाप पर थिरके
दिल किताबों की ताल पर नाचा
हम ने फ़िरऔन का क़सीदा लिखा
हम ने कूफ़े में मरसिए बेचे
हम ने बोसों का कारोबार किया
हम ने आँखों के आइने बेचे
ज़िंदगी की लगन नहीं हम को
ज़िंदगी की हमें थकन भी नहीं
हम कि हीरो नहीं विलेन भी नहीं
Read Fullहम पतंगों पे लेट कर रोए
सूरजों ने हमारे होंटों पर
अपने होंटों का शहद टपकाया
और हमारी शिकम तसल्ली को
जून की छातियों में दूध आया
बर्फ़ बिस्तर बनी हमारे लिए
और दोज़ख़ के सुर्ख़ रेशम से
हम ने अपने लिए लिहाफ़ बुने
ज़र्द शिरयान को धुएँ से भरा
फेफड़ों पर सियाह राख मली
नागा-साकी में फूल काश्त किए
नज़्म बेरूत में मुकम्मल की
लोरका को कलाई पर बाँधा
हो-ची-मिन्ह को नियाम में रखा
साढ़े लेनिन बजे स्कूल गए
सुब्ह-ए-ईसा को शाम में रक्खा
अरमुग़ान-ए-हिजाज़ में सोए
होलीवुड की अज़ान पर जागे
डाइरी में सुधार था लिखा
दर्द को फ़लसफ़े की लोरी दी
ज़ख़्म पर शाइ'री का फाहा रक्खा
तन मशीनों की थाप पर थिरके
दिल किताबों की ताल पर नाचा
हम ने फ़िरऔन का क़सीदा लिखा
हम ने कूफ़े में मरसिए बेचे
हम ने बोसों का कारोबार किया
हम ने आँखों के आइने बेचे
ज़िंदगी की लगन नहीं हम को
ज़िंदगी की हमें थकन भी नहीं
हम कि हीरो नहीं विलेन भी नहीं
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बर्फ़ के शहर की वीरान गुज़रगाहों पर
मेरे ही नक़्श-ए-क़दम मेरे सिपाही हैं
मेरे ही नक़्श-ए-क़दम मेरे सिपाही हैं
मिरा हौसला हैं
ज़िंदगियाँ
अपने गुनाहों की पनह-गाहों में हैं
रक़्स-कुनाँ
रौशनियाँ
बंद दरवाज़ों की दर्ज़ों से टपकती हुई
क़तरा क़तरा
शब की दहलीज़ पे गिरती हैं कभी
कोई मदहोश सी ले
जामा मय ओढ़ के आती है गुज़र जाती है
रात कुछ और बिफर जाती है
और बढ़ जाती हैं ख़ामोश खड़ी दीवारें
बे-सदा सदियों के चूने से चुनी दीवारें
जो कि माज़ी भी हैं मुस्तक़बिल भी
जिन के पीछे है कहीं
आतिश-ए-लम्हा-ए-मौजूद कि जो
लम्हा-ए-मौजूद की हसरत है
मिरी नज़्म की हैरत है जिसे
ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं
घूमता फिरता हूँ मैं बर्फ़ भरी रात की वीरानी में
अन-कही नज़्म की तुग़्यानी में
हैं भँवर कितने गुहर कितने हैं
कितने अलापें पस-ए-पर्दा ला
चश्म-ए-ना-बीना के आफ़ाक़ में
कितने बे-रंग करे
कितने धनक रंग ख़ला
कितने सपने हैं कि जो
शहर के तंग पुलों के नीचे
रेस्तुरानों की महक ओढ़ के सो जाते हैं
कितनी नींदें हैं कि जो अपने शबिस्तानों में
वेलियम चाटती हैं
जागती हैं
Read Fullज़िंदगियाँ
अपने गुनाहों की पनह-गाहों में हैं
रक़्स-कुनाँ
रौशनियाँ
बंद दरवाज़ों की दर्ज़ों से टपकती हुई
क़तरा क़तरा
शब की दहलीज़ पे गिरती हैं कभी
कोई मदहोश सी ले
जामा मय ओढ़ के आती है गुज़र जाती है
रात कुछ और बिफर जाती है
और बढ़ जाती हैं ख़ामोश खड़ी दीवारें
बे-सदा सदियों के चूने से चुनी दीवारें
जो कि माज़ी भी हैं मुस्तक़बिल भी
जिन के पीछे है कहीं
आतिश-ए-लम्हा-ए-मौजूद कि जो
लम्हा-ए-मौजूद की हसरत है
मिरी नज़्म की हैरत है जिसे
ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं
घूमता फिरता हूँ मैं बर्फ़ भरी रात की वीरानी में
अन-कही नज़्म की तुग़्यानी में
हैं भँवर कितने गुहर कितने हैं
कितने अलापें पस-ए-पर्दा ला
चश्म-ए-ना-बीना के आफ़ाक़ में
कितने बे-रंग करे
कितने धनक रंग ख़ला
कितने सपने हैं कि जो
शहर के तंग पुलों के नीचे
रेस्तुरानों की महक ओढ़ के सो जाते हैं
कितनी नींदें हैं कि जो अपने शबिस्तानों में
वेलियम चाटती हैं
जागती हैं
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शाम हो
आम सी शाम हो
आम सी शाम हो
जिस की हद-बंदियों में क़फ़स भी हों और आशियाँ भी
हवाओं की आहट पे खुलते दरीचे भी हों
आईनों में घिरे नन्हे मुन्ने परिंदों का रक़्स-ए-दम-ए-वापसीं
हर नफ़स पर-ब-पर यूरिश-ए-राएगाँ भी
आम सी शाम हो
लेकिन इस शाम के रास्ते मेरे घर जा रुकें
घर की दहलीज़ पर
मेरी माँ
मुस्कुराते हुए मेरे गिर्यां दिनों की थकन चूम ले
शाम की सरहदों से मुअज़्ज़िन पुकारे तो
सब भाई बहनों की चुप में मिरी चुप भी हो
शाम की सेज पर बाप के जिस्म से मेरे बाज़ू उगें
जब मुंडेरों पे रक्खे दिए जगमगाने लगें
टूटते फ़र्श पर मेरा भी अक्स हो
मेरा भी नाम हो
आम सी शाम हो
शाम सी शाम हो
Read Fullहवाओं की आहट पे खुलते दरीचे भी हों
आईनों में घिरे नन्हे मुन्ने परिंदों का रक़्स-ए-दम-ए-वापसीं
हर नफ़स पर-ब-पर यूरिश-ए-राएगाँ भी
आम सी शाम हो
लेकिन इस शाम के रास्ते मेरे घर जा रुकें
घर की दहलीज़ पर
मेरी माँ
मुस्कुराते हुए मेरे गिर्यां दिनों की थकन चूम ले
शाम की सरहदों से मुअज़्ज़िन पुकारे तो
सब भाई बहनों की चुप में मिरी चुप भी हो
शाम की सेज पर बाप के जिस्म से मेरे बाज़ू उगें
जब मुंडेरों पे रक्खे दिए जगमगाने लगें
टूटते फ़र्श पर मेरा भी अक्स हो
मेरा भी नाम हो
आम सी शाम हो
शाम सी शाम हो
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