हुस्न-ए-बे-परवा को ख़ुद-बीन ओ ख़ुद-आरा कर दिया
क्या किया मैं ने कि इज़हार-ए-तमन्ना कर दिया
बढ़ गईं तुम से तो मिल कर और भी बेताबियाँ
हम ये समझे थे कि अब दिल को शकेबा कर दिया
पढ़ के तेरा ख़त मिरे दिल की अजब हालत हुई
इज़्तिराब-ए-शौक़ ने इक हश्र बरपा कर दिया
हम रहे याँ तक तिरी ख़िदमत में सरगर्म-ए-नियाज़
तुझ को आख़िर आश्ना-ए-नाज़-ए-बेजा कर दिया
अब नहीं दिल को किसी सूरत किसी पहलू क़रार
उस निगाह-ए-नाज़ ने क्या सेहर ऐसा कर दिया
इश्क़ से तेरे बढ़े क्या क्या दिलों के मर्तबे
मेहर ज़र्रों को किया क़तरों को दरिया कर दिया
क्यूँ न हो तेरी मोहब्बत से मुनव्वर जान ओ दिल
शम्अ जब रौशन हुई घर में उजाला कर दिया
तेरी महफ़िल से उठाता ग़ैर मुझ को क्या मजाल
देखता था मैं कि तू ने भी इशारा कर दिया
सब ग़लत कहते थे लुत्फ़-ए-यार को वजह-ए-सुकूँ
दर्द-ए-दिल उस ने तो 'हसरत' और दूना कर दिया
और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है
इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है
दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल
हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है
तुम ने बाल अपने जो फूलों में बसा रक्खे हैं
शौक़ को और भी दीवाना बना रक्खा है
सख़्त बेदर्द है तासीर-ए-मोहब्बत कि उन्हें
बिस्तर-ए-नाज़ पे सोते से जगा रक्खा है
आह वो याद कि उस याद को हो कर मजबूर
दिल-ए-मायूस ने मुद्दत से भुला रक्खा है
क्या तअम्मुल है मिरे क़त्ल में ऐ बाज़ू-ए-यार
एक ही वार में सर तन से जुदा रक्खा है
हुस्न को जौर से बेगाना न समझो कि उसे
ये सबक़ इश्क़ ने पहले ही पढ़ा रक्खा है
तेरी निस्बत से सितमगर तिरे मायूसों ने
दाग़-ए-हिर्मां को भी सीने से लगा रक्खा है
कहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-मोहब्बत जिस को
नाम उसी का दिल-ए-मुज़्तर ने दवा रक्खा है
निगह-ए-यार से पैकान-ए-क़ज़ा का मुश्ताक़
दिल-ए-मजबूर निशाने पे खुला रक्खा है
इस का अंजाम भी कुछ सोच लिया है 'हसरत'
तू ने रब्त उन से जो इस दर्जा बढ़ा रक्खा है
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे
वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे
दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद
तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे
ख़िरद का नाम जुनूँ पड़ गया जुनूँ का ख़िरद
जो चाहे आप का हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ करे
तिरे सितम से मैं ख़ुश हूँ कि ग़ालिबन यूँ भी
मुझे वो शामिल-ए-अरबाब-ए-इम्तियाज़ करे
ग़म-ए-जहाँ से जिसे हो फ़राग़ की ख़्वाहिश
वो उन के दर्द-ए-मोहब्बत से साज़-बाज़ करे
उम्मीद-वार हैं हर सम्त आशिक़ों के गिरोह
तिरी निगाह को अल्लाह दिल-नवाज़ करे
तिरे करम का सज़ा-वार तो नहीं 'हसरत'
अब आगे तेरी ख़ुशी है जो सरफ़राज़ करे
रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम
हैरत ग़ुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़्तिराब
दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम
अल्लाह-री जिस्म-ए-यार की ख़ूबी कि ख़ुद-ब-ख़ुद
रंगीनियों में डूब गया पैरहन तमाम
दिल ख़ून हो चुका है जिगर हो चुका है ख़ाक
बाक़ी हूँ मैं मुझे भी कर ऐ तेग़-ज़न तमाम
देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम
है नाज़-ए-हुस्न से जो फ़रोज़ाँ जबीन-ए-यार
लबरेज़ आब-ए-नूर है चाह-ए-ज़क़न तमाम
नश-ओ-नुमा-ए-सब्ज़ा-ओ-गुल से बहार में
शादाबियों ने घेर लिया है चमन तमाम
उस नाज़नीं ने जब से किया है वहाँ क़याम
गुलज़ार बन गई है ज़मीन-ए-दकन तमाम
अच्छा है अहल-ए-जौर किए जाएँ सख़्तियाँ
फैलेगी यूँ ही शोरिश-ए-हुब्ब-ए-वतन तमाम
समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग
मग़रिब के यूँ हैं जमा ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम
शीरीनी-ए-नसीम है सोज़-ओ-गदाज़-ए-'मीर'
'हसरत' तिरे सुख़न पे है लुत्फ़-ए-सुख़न तमाम
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं
न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़ियत-ए-सहबा के अफ़्साने
शराब-ए-बे-ख़ुदी के मुझ को साग़र याद आते हैं
रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
हक़ीक़त खुल गई 'हसरत' तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं
'हसरत' की भी क़ुबूल हो मथुरा में हाज़िरी
सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है आज
नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं