0

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं  - Hasrat Mohani

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं

न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़ियत-ए-सहबा के अफ़्साने
शराब-ए-बे-ख़ुदी के मुझ को साग़र याद आते हैं

रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हक़ीक़त खुल गई 'हसरत' तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं

Hasrat Mohani
0

Share this on social media

Yaad Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Hasrat Mohani

As you were reading Shayari by Hasrat Mohani

Similar Writers

our suggestion based on Hasrat Mohani

Similar Moods

As you were reading Yaad Shayari