har haal men raha jo tira aasraa mujhe | हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे

  - Hasrat Mohani

हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे
मायूस कर सका न हुजूम-ए-बला मुझे

हर नग़्में ने उन्हीं की तलब का दिया पयाम
हर साज़ ने उन्हीं की सुनाई सदा मुझे

हर बात में उन्हीं की ख़ुशी का रहा ख़याल
हर काम से ग़रज़ है उन्हीं की रज़ा मुझे

रहता हूँ ग़र्क़ उन के तसव्वुर में रोज़ ओ शब
मस्ती का पड़ गया है कुछ ऐसा मज़ा मुझे

रखिए न मुझ पे तर्क-ए-मोहब्बत की तोहमतें
जिस का ख़याल तक भी नहीं है रवा मुझे

क्या कहते हो कि और लगा लो किसी से दिल
तुम सा नज़र भी आए कोई दूसरा मुझे

बेगाना-ए-अदब किए देती है क्या करूँं
उस महव-ए-नाज़ की निगह-ए-आशना मुझे

उस बे-निशां के मिलने की 'हसरत' हुई उम्मीद
आब-ए-बक़ा से बढ़ के है ज़हर-ए-फ़ना मुझे

  - Hasrat Mohani

Ijazat Shayari

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