Bharat Bhushan Pant

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Bharat Bhushan Pant shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bharat Bhushan Pant's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अब तो इतनी बार हम रस्ते में ठोकर खा चुके अब तो हम को भी वो पत्थर देख लेना चाहिए — Bharat Bhushan Pant
याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं या बहुत मसरूफ़ हूँ मैं या बहुत फ़ुर्सत में हूँ — Bharat Bhushan Pant

Ghazal

किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है तआक़ुब में कोई गुमनाम साया रोज़ होता है किसी इक मोड़ पर हर रोज़ मुझ को मिल ही जाती है तआ'रुफ़ ज़िंदगी से ग़ाएबाना रोज़ होता है मैं इक अंजान मंज़िल के सफ़र पर जब निकलता हूँ तसव्वुर में कोई मानूस चेहरा रोज़ होता है यही तन्हाइयाँ हैं जो मुझे तुझ से मिलाती हैं इन्हीं ख़ामोशियों से तेरा चर्चा रोज़ होता है ये इक एहसास है ऐसा किसी से कह नहीं सकता तेरी मौजूदगी का घर में धोका रोज़ होता है शजर बेचारगी से देखता है इस तमाशा को जुदा शाख़ों से उस की कोई पत्ता रोज़ होता है मैं अपने आप पर भी ख़ुद को ज़ाहिर कर नहीं सकता मेरे एहसास पर इक सख़्त पहरा रोज़ होता है ये मंज़र देख कर हैरान रह जाती हैं मौजें भी यहाँ साहिल पे इक टूटा घरौंदा रोज़ होता है बहुत दिन से इन आँखों को यही समझा रहा हूँ मैं ये दुनिया है यहाँ तो इक तमाशा रोज़ होता है मैं इक किरदार की सूरत कई परतों में जीता हूँ मेरी बे-चेहरगी का एक चेहरा रोज़ होता है — Bharat Bhushan Pant
रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं आपस में घर-बार उलझने लगते हैं माज़ी की आँखों में झाँक के देखूँ तो कुछ चेहरे हर बार उलझने लगते हैं साल में इक ऐसा मौसम भी आता है फूलों से ही ख़ार उलझने लगते हैं घर की तन्हाई में अपने-आप से हम बन कर इक दीवार उलझने लगते हैं ये सब तो दुनिया में होता रहता है हम ख़ुद से बे-कार उलझने लगते हैं कब तक अपना हाल बताएँ लोगों को तंग आ कर बीमार उलझने लगते हैं जब दरिया का कोई छोर नहीं मिलता कश्ती से पतवार उलझने लगते हैं कुछ ख़बरों से इतनी वहशत होती है हाथों से अख़बार उलझने लगते हैं कोई कहानी जब बोझल हो जाती है नाटक के किरदार उलझने लगते हैं — Bharat Bhushan Pant
आईने से पर्दा कर के देखा जाए ख़ुद को इतना तन्हा कर के देखा जाए हम भी तो देखें हम कितने सच्चे हैं ख़ुद से भी इक वा'दा कर के देखा जाए दीवारों को छोटा करना मुश्किल है अपने क़द को ऊँचा कर के देखा जाए रातों में इक सूरज भी दिख जाएगा हर मंज़र को उल्टा कर के देखा जाए दरिया ने भी तरसाया है प्यासों को दरिया को भी प्यासा कर के देखा जाए अब आँखों से और न देखा जाएगा अब आँखों को अंधा कर के देखा जाए ये सपने तो बिल्कुल सच्चे लगते हैं इन सपनों को सच्चा कर के देखा जाए घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ इक दिन अपना पीछा कर के देखा जाए — Bharat Bhushan Pant
अँधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है बुझे चराग़ को फिर से जलाना पड़ता है ये और बात है घबरा रहा है दिल वर्ना ग़मों का बोझ तो सब को उठाना पड़ता है कभी कभी तो इन अश्कों की आबरू के लिए न चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है अब अपनी बात को कहना बहुत ही मुश्किल है हर एक बात को कितना घुमाना पड़ता है वगर्ना गुफ़्तुगू करती नहीं ये ख़ामोशी हर इक सदा को हमें चुप कराना पड़ता है अब अपने पास तो हम ख़ुद को भी नहीं मिलते हमें भी ख़ुद से बहुत दूर जाना पड़ता है इक ऐसा वक़्त भी आता है ज़िंदगी में कभी जब अपने साए से पीछा छुड़ाना पड़ता है बस एक झूट कभी आइने से बोला था अब अपने आप से चेहरा छुपाना पड़ता है हमारे हाल पे अब छोड़ दे हमें दुनिया ये बार बार हमें क्यूँँ बताना पड़ता है — Bharat Bhushan Pant