ek naye saanche men dhal jaata hooñ main | एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं

  - Bharat Bhushan Pant

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं
क़तरा क़तरा रोज़ पिघल जाता हूँ मैं

जब से वो इक सूरज मुझ में डूबा है
ख़ुद को भी छू लूँ तो जल जाता हूँ मैं

आईना भी हैरानी में डूबा है
इतना कैसे रोज़ बदल जाता हूँ मैं

मीठी मीठी बातों में मा'लूम नहीं
जाने कितना ज़हर उगल जाता हूँ मैं

अब ठोकर खाने का मुझ को ख़ौफ़ नहीं
गिरता हूँ तो और सँभल जाता हूँ मैं

अक्सर अब अपना पीछा करते करते
ख़ुद से कितनी दूर निकल जाता हूँ मैं

  - Bharat Bhushan Pant

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