Nadeem Bhabha

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    दिखा रहा हूँ तमाशा समझ में आ जाए
    कि एक बार उसे दुनिया समझ में आ जाए

    ये लोग जा तो रहे हैं नए ज़माने में
    दुआ करो इन्हें रस्ता समझ में आ जाए

    ग़लत न जान कि आँखें नहीं रहीं मेरी
    सो छू रहा हूँ कि चेहरा समझ में आ जाए

    ख़ुदा करे तुझे तहज़ीब-ए-मय-कशी हो नसीब
    ख़ुदा करे तुझे नश्शा समझ में आ जाए

    ये लोग जंग की बातें नहीं करेंगे अगर
    गली में खेलता बच्चा समझ में आ जाए

    हम उस को अपना समझते हैं अपना मानते हैं
    जिसे हमारा इलाक़ा समझ में आ जाए

    'नदीम' दूसरा उन को दिखाई देता नहीं
    'नदीम' जिन को भी पहला समझ में आ जाए
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    बस यही कुछ है मर्तबा मिरे पास
    एक तू है और इक दुआ मिरे पास

    तुझे कुछ वक़्त चाहिए मिरी जान
    वक़्त ही तो नहीं बचा मिरे पास

    रौशनी हिफ़्ज़ हो चुकी है मुझे
    रख गया था कोई दिया मिरे पास

    ये तिरी गुफ़्तुगू का लम्हा है
    इस घड़ी है मिरा ख़ुदा मिरे पास

    टहनियाँ झुक रही थीं तेरे लिए
    और फल टूट के गिरा मिरे पास

    एक रूमाल आँसूओं से भरा
    और इक ख़त जला हुआ मिरे पास

    तेरा नेमुल-बदल नहीं कोई
    तू फ़क़त एक ही तो था मिरे पास

    अब मैं झगड़ा करूँ तो किस से करूँ
    अब तो तू भी नहीं रहा मिरे पास
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    मिल रहे हो बड़ी अक़ीदत से
    ख़ौफ़ आता है इतनी इज़्ज़त से

    हम ज़ियादा बिगाड़ देते हैं
    बच के रहना हमारी सोहबत से

    लोग किरदार बनना चाहते हैं
    जैसे मुमकिन है सब रियाज़त से

    उस के दिल में उतरने लगता हूँ
    जो मुझे देखता है नफ़रत से

    ज़हर ईजाद हो गया इक दिन
    लोग मरते थे पहले ग़ैरत से

    पर्दा-दारों ने ख़ुद-कुशी कर ली
    सहन झाँका गया किसी छत से

    फ़ासले बढ़ गए रिफ़ाक़त में
    दूरियाँ पड़ गई हैं क़ुर्बत से

    उस ने मुझ को भुला दिया इक दिन
    और भुलाया भी किस सुहूलत से

    अपनी गर्दन झुका के बात करो
    तुम निकाले गए हो जन्नत से
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    देखो उस का हिज्र निभाना पड़ता है
    वो जैसा चाहे हो जाना पड़ता है

    सुनते कब हैं लोग हमें बस देखते हैं
    चेहरे को आवाज़ बनाना पड़ता है

    इन अंधे और बहरे लोगों को साईं
    होने का एहसास दिलाना पड़ता है

    अभी हमारे अंदर आग नहीं भड़की
    अभी हमें सिगरेट सुलगाना पड़ता है

    कुछ आँखें ही ऐसी होती हैं जिन को
    कोई न कोई ख़्वाब दिखाना पड़ता है

    इस दुनिया को छोड़ के जिस में तुम भी हो
    जाता कौन है लेकिन जाना पड़ता है

    कुछ फूलों की ख़ातिर भी कुछ फूलों का
    सब से अच्छा रंग चुराना पड़ता है
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    राह में छोड़ कर नहीं जाता
    साथ होता अगर नहीं जाता

    उँगलियाँ फेर मेरे बालों में
    ये मिरा दर्द-ए-सर नहीं जाता

    यूँ लगा हूँ तिरे गले से मैं
    जिस तरह कोई डर नहीं जाता

    क्यों मिरा आस-पास घूमता है
    क्यों ये नश्शा उतर नहीं जाता

    यूँ पड़ा हूँ तुम्हारी यादों में
    जिस तरह कोई मर नहीं जाता

    कितना अच्छा था हम से पहले वहाँ
    कोई रस्ता अगर नहीं जाता

    इश्क़ इतना भी क्या ज़रूरी है
    कोई बे-इश्क़ मर नहीं जाता
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    सुहुलत हो अज़िय्यत हो तुम्हारे साथ रहना है
    कि अब कोई भी सूरत हो तुम्हारे साथ रहना है

    हमारे राब्ते ही इस क़दर हैं, तुम हो और बस तुम
    तुम्हें सब से मोहब्बत हो तुम्हारे साथ रहना है

    और अब घर-बार जब हम छोड़ कर आ ही चुके हैं तो
    तुम्हें जितनी भी नफ़रत हो तुम्हारे साथ रहना है

    हमारे पाँव में कीलें और आँखों से लहू टपके
    हमारी जो भी हालत हो तुम्हारे साथ रहना है

    तुम्हें हर सुब्ह और हर शाम है बस देखते रहना
    तुम इतने ख़ूबसूरत हो तुम्हारे साथ रहना है
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    वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं
    हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं

    ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह
    ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं

    हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से
    हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं

    ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ
    अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं

    हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं
    हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं
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    जैसा हूँ जिस हाल में हूँ अच्छा हूँ मैं
    तुम ने ज़िंदा समझा तो ज़िंदा हूँ मैं

    इक आवाज़ के आते ही मर जाऊँगा
    इक आवाज़ के सुनने को ज़िंदा हूँ मैं

    खुले हुए दरवाज़े दस्तक भूल चुके
    इन्दर आ जाओ पहचान चुका हूँ मैं

    और कोई पहचान मिरी बनती ही नहीं
    जानते हैं सब लोग कि बस तेरा हूँ मैं

    जाने किस को राज़ी करना है मुझ को
    जाने किस की ख़ातिर नाच रहा हूँ मैं

    अब तो ये भी याद नहीं कि मोहब्बत में
    कब से तेरे पास हूँ और कितना हूँ मैं
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    मैं ऐसे मोड़ पर अपनी कहानी छोड़ आया हूँ
    किसी की आँख में पानी ही पानी छोड़ आया हूँ

    अभी तो उस से मिलने का बहाना और करना है
    अभी तो उस के कमरे में निशानी छोड़ आया हूँ

    बस इतना सोच कर ही मुझ को अपने पास तुम रख लो
    तुम्हारे वास्ते मैं हुक्मरानी छोड़ आया हूँ

    इसी ख़ातिर मिरे चारों तरफ़ फैला है सन्नाटा
    कहीं मैं अपने लफ़्ज़ों के मआनी छोड़ आया हूँ

    'नदीम' इस गर्दिश-ए-अफ़्लाक को मैं चाक समझा तो
    वहाँ पर ज़िंदगी अपनी बनानी छोड़ आया हूँ
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    तमाम उम्र जले और रौशनी नहीं की
    ये ज़िंदगी है तो फिर हम ने ज़िंदगी नहीं की

    सितम तो ये है कि मेरे ख़िलाफ़ बोलते हैं
    वो लोग जिन से कभी मैं ने बात भी नहीं की

    जो दिल में आता गया सिद्क़-ए-दिल से लिखता गया
    दुआएँ माँगी हैं मैं ने तो शाएरी नहीं की

    बस इतना है कि मिरा बख़्त ढल गया और फिर
    मिरे चराग़ ने भी मुझ पे रौशनी नहीं की

    मिरी सिपाह से दुनिया लरज़ने लगती है
    मगर तुम्हारी तो मैं ने बराबरी नहीं की

    कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम'
    सभी को दोस्त बनाया है दुश्मनी नहीं की
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