tamaam 'umr jale aur raushni nahin ki | तमाम 'उम्र जले और रौशनी नहीं की

  - Nadeem Bhabha

तमाम 'उम्र जले और रौशनी नहीं की
ये ज़िंदगी है तो फिर हम ने ज़िंदगी नहीं की

सितम तो ये है कि मेरे ख़िलाफ़ बोलते हैं
वो लोग जिन से कभी मैं ने बात भी नहीं की

जो दिल में आता गया सिद्क़-ए-दिल से लिखता गया
दुआएँ माँगी हैं मैं ने तो शाएरी नहीं की

बस इतना है कि मिरा बख़्त ढल गया और फिर
मिरे चराग़ ने भी मुझ पे रौशनी नहीं की

मिरी सिपाह से दुनिया लरज़ने लगती है
मगर तुम्हारी तो मैं ने बराबरी नहीं की

कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम'
सभी को दोस्त बनाया है दुश्मनी नहीं की

  - Nadeem Bhabha

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