vaqt ki tarah tire haath se nikle hue hain | वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं

  - Nadeem Bhabha

वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं
हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं

ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह
ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं

हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से
हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं

ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ
अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं

हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं
हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं

  - Nadeem Bhabha

Ehsaas Shayari

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