Qabil Ajmeri

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Qabil Ajmeri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qabil Ajmeri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़माना दोस्त है किस किस को याद रक्खोगे ख़ुदा करे कि तुम्हें मुझ से दुश्मनी हो जाए — Qabil Ajmeri
बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से कहीं ज़िन्दगी को क़रार आ न जाए — Qabil Ajmeri
रास्ता है कि कटता जाता है फ़ासला है कि कम नहीं होता — Qabil Ajmeri
वक़्त करता है परवरिश बरसों हादिसा एक दम नहीं होता — Qabil Ajmeri

Ghazal

हवादिस हम-सफ़र अपने तलातुम हम-इनाँ अपना ज़माना लूट सकता है तो लूटे कारवाँ अपना नसीम-ए-सुब्ह से क्या टूटता ख़्वाब-ए-गिराँ अपना कोई नादान बिजली छू गई है आशियाँ अपना हमें भी देख लो आसार-ए-मंज़िल देखने वालो कभी हम ने भी देखा था ग़ुबार-ए-कारवाँ अपना मिज़ाज-ए-हुस्न पर क्या क्या गुज़रता है गिराँ फिर भी किसी को आ ही जाता है ख़याल-ए-ना-गहाँ अपना अज़ल से कर रही है ज़िंदगानी तजरबे लेकिन ज़माना आज तक समझा नहीं सूद ओ ज़ियाँ अपना जमाल-ए-दोस्त को पैहम बिखरना है सँवरना है मोहब्बत ने उठाया है अभी पर्दा कहाँ अपना हमेशा शम्अ' भड़केगी सदा पैमाना छलकेगा तिरी महफ़िल में हम छोड़ आए हैं जोश-ए-बयाँ अपना — Qabil Ajmeri
दिल-ए-दीवाना अर्ज़-ए-हाल पर माइल तो क्या होगा मगर वो पूछ बैठे ख़ुद ही हाल-ए-दिल तो क्या होगा हमारा क्या हमें तो डूबना है डूब जाएँगे मगर तूफ़ान जा पहुँचा लब-ए-साहिल तो क्या होगा शराब-ए-नाब ही से होश उड़ जाते हैं इंसाँ के तिरा कैफ़-ए-नज़र भी हो गया शामिल तो क्या होगा ख़िरद की रहबरी ने तो हमें ये दिन दिखाए हैं जुनूँ हो जाएगा जब रहबर-ए-मंज़िल तो क्या होगा कोई पूछे तो साहिल पर भरोसा करने वालों से अगर तूफ़ाँ की ज़द में आ गया साहिल तो क्या होगा ख़ुद उस की ज़िंदगी अब उस से बरहम होती जाती है उन्हें होगा भी पास-ए-ख़ातिर-ए-'क़ाबिल' तो क्या होगा — Qabil Ajmeri
तुम्हें जो मेरे ग़म-ए-दिल से आगही हो जाए जिगर में फूल खिलें आँख शबनमी हो जाए अजल भी उस की बुलंदी को छू नहीं सकती वो ज़िंदगी जिसे एहसास-ए-ज़िंदगी हो जाए यही है दिल की हलाकत यही है इश्क़ की मौत निगाह-ए-दोस्त पे इज़हार-ए-बेकसी हो जाए ज़माना दोस्त है किस किस को याद रक्खोगे ख़ुदा करे कि तुम्हें मुझ से दुश्मनी हो जाए सियाह-ख़ाना-ए-दिल में है ज़ुल्मतों का हुजूम चराग़-ए-शौक़ जलाओ कि रौशनी हो जाए तुलू-ए-सुब्ह पे होती है और भी नमनाक वो आँख जिस की सितारों से दोस्ती हो जाए अजल की गोद में 'क़ाबिल' हुई है उम्र तमाम अजब नहीं जो मिरी मौत ज़िंदगी हो जाए — Qabil Ajmeri
सुराही का भरम खुलता न मेरी तिश्नगी होती ज़रा तुम ने निगाह-ए-नाज़ को तकलीफ़ दी होती मक़ाम-ए-आशिक़ी दुनिया ने समझा ही नहीं वर्ना जहाँ तक तेरा ग़म होता वहीं तक ज़िंदगी होती तुम्हारी आरज़ू क्यूँँ दिल के वीराने में आ पहुँची बहारों में पली होती सितारों में रही होती ज़माने की शिकायत क्या ज़माना किस की सुनता है मगर तुम ने तो आवाज़-ए-जुनूँ पहचान ली होती ये सब रंगीनियाँ ख़ून-ए-तमन्ना से इबारत हैं शिकस्त-ए-दिल न होती तो शिकस्त-ए-ज़िंदगी होती रज़ा-ए-दोस्त 'क़ाबिल' मेरा मेयार-ए-मोहब्बत है उन्हें भी भूल सकता था अगर उन की ख़ुशी होती — Qabil Ajmeri
वो हर मक़ाम से पहले वो हर मक़ाम के बा'द सहर थी शाम से पहले सहर है शाम के बा'द हर इंक़िलाब मुबारक हर इंक़िलाब अज़ाब शिकस्त-ए-जाम से पहले शिकस्त-ए-जाम के बा'द मुझी पे इतनी तवज्जोह मुझी से इतना गुरेज़ मिरे सलाम से पहले मिरे सलाम के बा'द चराग़-ए-बज़्म-ए-सितम हैं हमारा हाल न पूछ जले थे शाम से पहले बुझे हैं शाम के बा'द ये रात कुछ भी नहीं थी ये रात सब कुछ है तुलू-ए-जाम से पहले तुलू-ए-जाम के बा'द वही ज़बाँ वही बातें मगर है कितना फ़र्क़ तुम्हारे नाम से पहले तुम्हारे नाम के बा'द हयात गिर्या-ए-शबनम हयात रक़्स-ए-शरर तिरे पयाम से पहले तिरे पयाम के बा'द ये तर्ज़-ए-फ़िक्र ये रंग-ए-सुख़न कहाँ 'क़ाबिल' तिरे कलाम से पहले तिरे कलाम के बा'द — Qabil Ajmeri
तज़ाद-ए-जज़्बात में ये नाज़ुक मक़ाम आया तो क्या करोगे मैं रो रहा हूँ तुम हँस रहे हो मैं मुस्कुराया तो क्या करोगे मुझे तो इस दर्जा वक़्त-ए-रुख़्सत सुकूँ की तल्क़ीन कर रहे हो मगर कुछ अपने लिए भी सोचा मैं याद आया तो क्या करोगे अभी तो तन्क़ीद हो रही है मिरे मज़ाक़-ए-जुनूँ पे लेकिन तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की बरहमी का सवाल आया तो क्या करोगे तुम्हारे जल्वों की रौशनी में नज़र की हैरानियाँ मुसल्लम मगर किसी ने नज़र के बदले जो दिल आज़माया तो क्या करोगे उतर तो सकते हो यार लेकिन मआल पर भी निगाह कर लो ख़ुदा-ना-कर्दा सुकून-ए-साहिल न रास आया तो क्या करोगे कुछ अपने दिल पर भी ज़ख़्म खाओ मिरे लहू की बहार कब तक मुझे सहारा बनाने वालो मैं लड़खड़ाया तो क्या करोगे अभी तो दामन छुड़ा रहे हो बिगड़ के 'क़ाबिल' से जा रहे हो मगर कभी दिल की धड़कनों में शरीक पाया तो क्या करोगे — Qabil Ajmeri
जहान-ए-आरज़ू आवाज़ ही आवाज़ होता है बड़ी मुश्किल से एहसास-ए-शिकस्त-ए-साज़ होता है हमें क्या आप अंजाम-ए-मोहब्बत से डराते हैं हमारे ख़ून से हर दौर का आग़ाज़ होता है क़फ़स है दाम है भड़की हुई है आतिश-ए-गुल भी इसी माहौल में अंदाज़ा-ए-परवाज़ होता है पिघल जाती हैं ज़ंजीरें सुलग उठती हैं दीवारें लब-ए-ख़ामोश में वो शोला-ए-आवाज़ होता है मोहब्बत की हक़ीक़त खुल गई चाक-ए-गिरेबाँ से जुनूँ भी एक मंज़िल में ज़माना-साज़ होता है हमीं पर मुनहसिर है रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ 'क़ाबिल' कोई नग़्मा हो अपना ही रहीन-ए-साज़ होता है — Qabil Ajmeri
वो कब आएँ ख़ुदा जाने सितारो तुम तो सो जाओ हुए हैं हम तो दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ कहाँ तक मुझ से हमदर्दी कहाँ तक मेरी ग़म-ख़्वारी हज़ारों ग़म हैं अनजाने सितारो तुम तो सो जाओ गुज़र जाएगी ग़म की रात उम्मीदो तो जाग उट्ठो सँभल जाएँगे दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ हमें रूदाद-ए-हस्ती रात भर में ख़त्म करनी है न छेड़ो और अफ़्साने सितारो तुम तो सो जाओ हमारे दीदा-ए-बे-ख़्वाब को तस्कीन क्या दोगे हमें लूटा है दुनिया ने सितारो तुम तो सो जाओ उसे 'क़ाबिल' की चश्म-ए-नम से देरीना तअ'ल्लुक़ है शब-ए-ग़म तुम को क्या जाने सितारो तुम तो सो जाओ — Qabil Ajmeri