maa ki aaghosh mein kal maut ki aaghosh mein aaj | माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज

  - Kaif Bhopali

माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले

  - Kaif Bhopali

Maa Shayari

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    दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले
    हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

    हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
    वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले

    ख़ुद से मिल जाते तो चाहत का भरम रह जाता
    क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले

    माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
    हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले

    कभी लिखवाने गए ख़त कभी पढ़वाने गए
    हम हसीनों से इसी हीले बहाने से मिले

    इक नया ज़ख़्म मिला एक नई उम्र मिली
    जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले

    एक हम ही नहीं फिरते हैं लिए क़िस्सा-ए-ग़म
    उन के ख़ामोश लबों पर भी फ़साने से मिले

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    उन के ख़त आज हमें तेरे सिरहाने से मिले
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    Kaif Bhopali
    अल्लाह ये किस का मातम है वो ज़ुल्फ़ जो बिखरी जाती है
    आँखें है कि भीगी जाती हैं दुनिया है कि डूबी जाती है

    कुछ बीते दिनों की यादें हैं और चारों तरफ़ तन्हाई सी
    मेहमाँ हैं कि आए जाते हैं महफ़िल है कि उजड़ी जाती है

    तदबीर के हाथों कुछ न हुआ तक़दीर की मुश्किल हल न हुई
    नाख़ुन हैं कि टूटे जाते हैं गुत्थी है कि उलझी जाती है

    क्या कोई मोहब्बत में यूँ भी बेनाम-ओ-निशाँ हो जाता है
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    Kaif Bhopali
    हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ
    तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ

    ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
    दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ

    क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात
    करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ

    क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार
    आहटें घबराहटें परछाइयाँ

    एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं
    शाहियाँ सुल्तानियाँ दाराइयाँ

    एक पैकर में सिमट कर रह गईं
    ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ

    रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर
    हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ

    ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं
    बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ

    दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने
    लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ

    मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं
    चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ

    उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं
    उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ

    'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह
    वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ
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    Kaif Bhopali
    वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक़ था
    दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से
    Kaif Bhopali
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    सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए
    सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए

    ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए
    हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए

    ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की
    मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए

    वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ
    मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए

    मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम
    निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए
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    Kaif Bhopali

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