Ahmad Nadeem Qasmi

Ahmad Nadeem Qasmi

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Ahmad Nadeem Qasmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Nadeem Qasmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी — Ahmad Nadeem Qasmi
जो दिल दुखा है तो ये अज़्म भी मिला है हमें तमाम उम्र किसी का न दिल दुखाएँगे हम — Ahmad Nadeem Qasmi
जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा — Ahmad Nadeem Qasmi
ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे — Ahmad Nadeem Qasmi
मैं तो उस वक़्त से डरता हूँ कि वो पूछ न ले ये अगर ज़ब्त का आँसू है तो टपका कैसे — Ahmad Nadeem Qasmi
उस वक़्त का हिसाब क्या दूँ जो तेरे बग़ैर कट गया है — Ahmad Nadeem Qasmi

Ghazal

एहसास में फूल खिल रहे हैं पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं कुछ इतनी शदीद तीरगी है आँखों में सितारे तैरते हैं देखें तो हवा जमी हुई है सोचें तो दरख़्त झूमते हैं सुक़रात ने ज़हर पी लिया था हम ने जीने के दुख सहे हैं हम तुझ से बिगड़ के जब भी उठे फिर तेरे हुज़ूर आ गए हैं हम अक्स हैं एक दूसरे का चेहरे ये नहीं हैं आइने हैं लम्हों का ग़ुबार छा रहा है यादों के चराग़ जल रहे हैं सूरज ने घने सनोबरों में जाले से शुआ'ओं के बुने हैं यकसाँ हैं फ़िराक़-ओ-वस्ल दोनों ये मरहले एक से कड़े हैं पा कर भी तो नींद उड़ गई थी खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं जो दिन तिरी याद में कटे थे माज़ी के खंडर बने खड़े हैं जब तेरा जमाल ढूँडते थे अब तेरा ख़याल ढूँडते हैं हम दिल के गुदाज़ से हैं मजबूर जब ख़ुश भी हुए तो रोए हैं हम ज़िंदा हैं ऐ फ़िराक़ की रात प्यारी तिरे बाल क्यूँँ खुले हैं — Ahmad Nadeem Qasmi
तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ — Ahmad Nadeem Qasmi
फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए — Ahmad Nadeem Qasmi
गुल तिरा रंग चुरा लाए हैं गुलज़ारों में जल रहा हूँ भरी बरसात की बौछारों में मुझ से कतरा के निकल जा मगर ऐ जान-ए-हया दिल की लौ देख रहा हूँ तिरे रुख़्सारों में हुस्न-ए-बेगाना-ए-एहसास-ए-जमाल अच्छा है ग़ुंचे खिलते हैं तो बिक जाते हैं बाज़ारों में ज़िक्र करते हैं तिरा मुझ से ब-उन्वान-ए-जफ़ा चारा-गर पर पिरो लाए हैं तलवारों में ज़ख़्म छुप सकते हैं लेकिन मुझे फ़न की सौगंद ग़म की दौलत भी है शामिल मिरे शहकारों में मुंतज़िर हैं कि कोई तेशा-ए-तख़लीक़ उठाए कितने असनाम अभी दफ़न हैं कोहसारों में मुझ को नफ़रत से नहीं प्यार से मस्लूब करो मैं तो शामिल हूँ मोहब्बत के गुनहगारों में — Ahmad Nadeem Qasmi
वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे शजर से टूट के जो फ़स्ल-ए-गुल पे रोए थे अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया अभी अभी तो हम इक दूसरे से बिछड़े थे तुम्हारे बा'द चमन पर जब इक नज़र डाली कली कली में ख़िज़ाँ के चराग़ जलते थे तमाम उम्र वफ़ा के गुनाहगार रहे ये और बात कि हम आदमी तो अच्छे थे शब-ए-ख़मोश को तन्हाई ने ज़बाँ दे दी पहाड़ गूँजते थे दश्त सनसनाते थे वो एक बार मिरे जिन को था हयात से प्यार जो ज़िंदगी से गुरेज़ाँ थे रोज़ मरते थे नए ख़याल अब आते हैं ढल के आहन में हमारे दिल में कभी खेत लहलहाते थे ये इर्तिक़ा का चलन है कि हर ज़माने में पुराने लोग नए आदमी से डरते थे 'नदीम' जो भी मुलाक़ात थी अधूरी थी कि एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे थे — Ahmad Nadeem Qasmi
वो जो इक उम्र से मसरूफ़ इबादात में थे आँख खोली तो अभी अर्सा-ए-ज़ुलमात में थे सिर्फ़ आफ़ात न थीं ज़ात-ए-इलाही का सुबूत फूल भी दश्त में थे हश्र भी जज़्बात में थे न ये तक़दीर का लिखा था न मंशा-ए-ख़ुदा हादसे मुझ पे जो गुज़रे मिरे हालात में थे मैं ने की हद्द-ए-नज़र पार तो ये राज़ खुला आसमाँ थे तो फ़क़त मेरे ख़यालात में थे मेरे दिल पर तो गिरीं आबले बन कर बूँदें कौन सी याद के सहरा थे जो बरसात में थे इस सबब से भी तो मैं क़ाबिल-ए-नफ़रत ठहरा जितने जौहर थे मोहब्बत के मिरी ज़ात में थे सिर्फ़ शैतान ही न था मुंकिर-ए-तकरीम 'नदीम' अर्श पर जितने फ़रिश्ते थे मिरी घात में थे — Ahmad Nadeem Qasmi
मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ 'नदीम' काश यही एक काम कर जाऊँ ये दश्त-ए-तर्क-ए-मोहब्बत ये तेरे क़ुर्ब की प्यास जो इज़्न हो तो तिरी याद से गुज़र जाऊँ मिरा वजूद मिरी रूह को पुकारता है तिरी तरफ़ भी चलूँ तो ठहर ठहर जाऊँ तिरे जमाल का परतव है सब हसीनों पर कहाँ कहाँ तुझे ढूँडूँ किधर किधर जाऊँ मैं ज़िंदा था कि तिरा इंतिज़ार ख़त्म न हो जो तू मिला है तो अब सोचता हूँ मर जाऊँ तिरे सिवा कोई शाइस्ता-वफ़ा भी तो हो मैं तेरे दर से जो उठूँ तो किस के घर जाऊँ ये सोचता हूँ कि मैं बुत-परस्त क्यूँँ न हुआ तुझे क़रीब जो पाऊँ तो ख़ुद से डर जाऊँ किसी चमन में बस इस ख़ौफ़ से गुज़र न हुआ किसी कली पे न भूले से पाँव धर जाऊँ ये जी में आती है तख़्लीक़-ए-फ़न के लम्हों में कि ख़ून बन के रग-ए-संग में उतर जाऊँ — Ahmad Nadeem Qasmi
कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो — Ahmad Nadeem Qasmi
मेरी महदूद बसारत का नतीजा निकला आसमाँ मेरे तसव्वुर से भी हल्का निकला रोज़-ए-अव्वल से है फ़ितरत का रक़ीब आदम-ज़ाद धूप निकली तो मिरे जिस्म से साया निकला सर-ए-दरिया था चराग़ाँ कि अजल रक़्स में थी बुलबुला जब कोई टूटा तो शरारा निकला बात जब थी कि सर-ए-शाम फ़रोज़ाँ होता रात जब ख़त्म हुई सुब्ह का तारा निकला मुद्दतों बा'द जो रोया हूँ तो ये सोचता हूँ आज तो सीना-ए-सहरा से भी दरिया निकला कुछ न था कुछ भी न था जब मिरे आसार ख़ुदे एक दिल था सो कई जगह से टूटा निकला लोग शहपारा-ए-यक-जाई जिसे समझे थे अपनी ख़ल्वत से जो निकला तो बिखरता निकला मेरा ईसार मिरे ज़ो'म में बे-अज्र न था और मैं अपनी अदालत में भी झूटा निकला मैं तो समझा था बहुत सर्द है ज़ाहिद का मिज़ाज उस के अंदर तो क़यामत का तमाशा निकला वही बे-अंत ख़ला है वही बे-सम्त सफ़र मेरा घर मेरे लिए आलम-ए-बाला निकला ज़िंदगी रेत के ज़र्रात की गिनती थी 'नदीम' क्या सितम है कि अदम भी वही सहरा निकला — Ahmad Nadeem Qasmi
जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया आफ़्ताब-ए-वक़्त नेज़े के बराबर आ गया दोस्ती की जब दुहाई दी तो शर्क़-ओ-ग़र्ब से हाथ में पत्थर लिए यारों का लश्कर आ गया इस सफ़र में गो तमाज़त तो बहुत थी हिज्र की मैं तिरी यादों की छाँव सर पे ले कर आ गया गो ज़मीन-ओ-आसमाँ मसरूफ़-ए-गर्दिश हैं मगर जब भी गर्दिश का सबब सोचा तो चक्कर आ गया आदमी को हश्र के मंज़र नज़र आने लगे उस के क़ब्ज़े में जब इक ज़र्रे का जौहर आ गया हुस्न-ए-इंसाँ दफ़्न हो जाने से मिटता है कहाँ फूल बन कर ख़ाक के पर्दे से बाहर आ गया अश्क जब टपके किसी बेकस की आँखों से 'नदीम' यूँँ लगा तूफ़ान की ज़द में समुंदर आ गया — Ahmad Nadeem Qasmi