ए'जाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का

इल्ज़ाम न धर इश्क़ पे शोरीदा-सरी का

इस वक़्त मिरे कल्बा-ए-ग़म में तिरा आना
भटका हुआ झोंका है नसीम-ए-सहरी का

तुझ से तिरे कूचे का पता पूछ रहा हूँ
इस वक़्त ये आलम है मिरी बे-ख़बरी का

ये फ़र्श तिरे रक़्स से जो गूँज रहा है
है अर्श-ए-मोअल्ला मिरी आली-नज़री का

कोहरे में तड़पते हुए ऐ सुब्ह के तारे
एहसान है शाइ'र पे तिरी चारागरी का

— Ahmad Nadeem Qasmi

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