तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा
घर जो सुलगा तो भरा शहर भी जल जाएगा
सामने आ कि मिरा 'इश्क़ है मंतिक़ में असीर
आग भड़की तो ये पत्थर भी पिघल जाएगा
दिल को मैं मुंतज़िर-ए-अब्र-ए-करम क्यूँँ रक्खूँ
फूल है क़तरा-ए-शबनम से बहल जाएगा
मौसम-ए-गुल अगर इस हाल में आया भी तो क्या
ख़ून-ए-गुल चेहरा-ए-गुलज़ार पे मल जाएगा
वक़्त के पाँव की ज़ंजीर है रफ़्तार-ए-'नदीम'
हम जो ठहरे तो उफ़ुक़ दूर निकल जाएगा
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ahmad Nadeem Qasmi
our suggestion based on Ahmad Nadeem Qasmi
As you were reading Paani Shayari Shayari