गो मिरे दिल के ज़ख़्म ज़ाती हैं इन की टीसें तो काएनाती हैंआदमी शश-जहात का दूल्हावक़्त की गर्दिशें बराती हैंफ़ैसले कर रहे हैं अर्श-नशींआफ़तें आदमी पे आती हैंकलियाँ किस दौर के तसव्वुर मेंख़ून होते ही मुस्कुराती हैंतेरे वादे हों जिन के शामिल-ए-हालवो उमंगें कहाँ समाती हैं— Ahmad Nadeem Qasmi