आख़िरी बार अंधेरे के पुजारी सुन लें
मैं सहर हूँ मैं उजाला हूँ हक़ीक़त हूँ मैं
मैं मोहब्बत का तो देता हूँ मोहब्बत से जवाब
लेकिन आ'दा के लिए क़हर-ओ-क़यामत हूँ मैं
मिरा दुश्मन मुझे ललकार के जाएगा कहाँ
ख़ाक का तैश हूँ अफ़्लाक की दहशत हूँ मैं
— Ahmad Nadeem Qasmi















