khuda kare ki tiri umr mein gine jaayen | ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ

  - Ahmad Nadeem Qasmi

ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ
वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे

  - Ahmad Nadeem Qasmi

Judai Shayari

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    उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो
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    Ahmad Nadeem Qasmi
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    इस वक़्त मिरे कल्बा-ए-ग़म में तिरा आना
    भटका हुआ झोंका है नसीम-ए-सहरी का

    तुझ से तिरे कूचे का पता पूछ रहा हूँ
    इस वक़्त ये आलम है मिरी बे-ख़बरी का

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    है अर्श-ए-मोअल्ला मिरी आली-नज़री का

    कोहरे में तड़पते हुए ऐ सुब्ह के तारे
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    Ahmad Nadeem Qasmi
    वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे
    शजर से टूट के जो फ़स्ल-ए-गुल पे रोए थे

    अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया
    अभी अभी तो हम इक दूसरे से बिछड़े थे

    तुम्हारे बा'द चमन पर जब इक नज़र डाली
    कली कली में ख़िज़ाँ के चराग़ जलते थे

    तमाम उम्र वफ़ा के गुनाहगार रहे
    ये और बात कि हम आदमी तो अच्छे थे

    शब-ए-ख़मोश को तन्हाई ने ज़बाँ दे दी
    पहाड़ गूँजते थे दश्त सनसनाते थे

    वो एक बार मिरे जिन को था हयात से प्यार
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    Ahmad Nadeem Qasmi
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