ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
जैसे जंगल है रास्ता भी है
यूँँ तो वादे हज़ार करता है
और वो शख़्स भूलता भी है
हम को हर सू नज़र भी रखनी है
और तेरे पास बैठना भी है
यूँँ भी आता नहीं मुझे रोना
और मातम की इब्तिदा भी है
चूमने हैं पसंद के बादल
शाम होते ही लौटना भी है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Karan Sahar
our suggestion based on Karan Sahar
As you were reading Gham Shayari Shayari