ज़ख़्म है दर्द है दवा भी हैजैसे जंगल है रास्ता भी हैयूँ तो वादे हज़ार करता हैऔर वो शख़्स भूलता भी हैहम को हर सू नज़र भी रखनी हैऔर तेरे पास बैठना भी हैयूँ भी आता नहीं मुझे रोनाऔर मातम की इब्तिदा भी हैचूमने हैं पसंद के बादलशाम होते ही लौटना भी है— Karan Sahar