दूर तलक था गहरा पानी
पीली धूप सुनहरा पानी
कितना सूना मंज़र गुज़रा
मानो आँख में ठहरा पानी
कश्ती अपना ग़म कहती हैं
सुनता कुछ नईं बेहरा पानी
नीचे ख़ूब ख़ज़ाने होंगे
उन के ऊपर पहरा पानी
उगते सूरज की अँगड़ाई
ढलती शाम का चेहरा पानी
— Karan Sahar
पीली धूप सुनहरा पानी
कितना सूना मंज़र गुज़रा
मानो आँख में ठहरा पानी
कश्ती अपना ग़म कहती हैं
सुनता कुछ नईं बेहरा पानी
नीचे ख़ूब ख़ज़ाने होंगे
उन के ऊपर पहरा पानी
उगते सूरज की अँगड़ाई
ढलती शाम का चेहरा पानी
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