ग़ैरों को मैं अक्सर अपना लगता हूँ
अपनों को क्यूँ ग़ैरों जैसा लगता हूँ
बाद में जाने सब को क्या हो जाता है
कुछ दिन तो मैं सबको अच्छा लगता हूँ
मुझको चाँद सितारों की महफ़िल से क्या
मैं जुगनू के साथ ही अच्छा लगता हूँ
जब भी मुझ सेे कोई मिलने आता है
तब मैं ख़ुद को और अकेला लगता हूँ
तेरी यादें हाथ छुड़ा कर भागी हैं
मैं क्या तुझको भूलने वाला लगता हूँ
शाम को भी जब लौट नहीं पाता हूँ मैं
सारे घर को सुब्ह का भूला लगता हूँ
As you were reading Shayari by Karan Sahar
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