दूर सहरा में जा के सोऍंगे
नींद को आज़मा के सोऍंगे
ख़्वाब बरसों जगा के रखते हैं
ख़वाब से बच बचा के सोऍंगे
आदमी वक़्त पर नहीं उठता
हम परिंदों में जा के सोऍंगे
तुम चराग़ों से गुफ़्तगू करना
हम तो चादर चढ़ा के सोऍंगे
शोर हो भीड़ हो कि जंगल हो
यार हम कुल मिला के सोऍंगे
— Karan Sahar















