रिश्तों में गुफ़्तगू का फ़्लेवर भी चाहिए
दीवार उठ चुकी है सो अब दर भी चाहिए
दिल भी लगा लिया है नई नौकरी भी है
हालात कह रहे हैं कि अब घर भी चाहिए
उस की निगाह-ए-नाज़ में आने के वास्ते
मेहनत के साथ साथ मुक़द्दर भी चाहिए
हम सब उदासियों से भरे लोग हैं सहर
हम को वफ़ा भी चाहिए ठोकर भी चाहिए
— Karan Sahar















