नया इक ज़ख़्म खाना चाहता हूँ
सबब लेकिन पुराना चाहता हूँ
तुम्हें कैसे ख़बर पहुँचे कि अब भी
मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
हमारे दरमियाँ जो फ़ासिला है
मैं उस पर पुल बनाना चाहता हूँ
यही मौक़ा' है मेरे घर जला दो
मैं हिजरत का बहाना चाहता हूँ
मुसलसल अपनी साँसें ख़र्च कर के
तेरी यादें कमाना चाहता हूँ
ख़ुदाया मैं तेरे उजड़े चमन से
निकलने का बहाना चाहता हूँ
— Karan Sahar















